चांदनी से धुले रात के पॄष्ठ पर

स्वप्न की जो कहानी नयन ने लिखी, चांदनी से धुले रात के पॄष्ठ पर
आज वह आपकी याद को छू गई, गीत बन कर नया गुनगुनाने लगी

कुछ सितारे पिघलते हुए रंग में कैनवस को गगन के सजाते रहे
कुछ निखरती हुई ओस में मिल गये, पाटलों को मधुर आ बनातेरहे
नभ की मंदाकिनी में लगा डुबकियाँ, एक नीहारिका खिलखिलाने लगी
राशि के चक्र की आ धुरी पर रुके,रोशनी में ढले जगमगाते रहे

ज्योति के अग्निमय पंथ पर जा खड़े बिन्दु थे ध्यान के स्वर्णवर्णी हुए
दॄष्टि के पारसों का परस जो मिला हर कली ध्यान की मुस्कुराने लगी

गंध निशिगंध की चूनरी से उड़ी, लिख कथानक गई भोर के पंथ का
वीथियॊं में उभरते रहे पत्र वे, जिनपे लिक्खा हुआ प्रीत अनुबन्ध था
कल्पना बादलों सी उमड़ते हुए आप ही आप को शिल्प देने लगी
बन पथिक आज मौसम चला झूमता, खाई गंगा किनारे की सौगन्ध सा

अंजलि में भरे निर्णयों के निमिष, आपकी दॄष्टि के पारसों से मिले
तो समय की शिला निश्चयों पे टिकी,सूखा पत्ता बनी डगमगाने लगी

चूड़ियों से छिटकती हुई रश्मियों ने रँगे चित्र आकर नये सांझ के
कंगनों ने खनकते हुए लिख दिये चन्द अध्याय, पायल पे आवाज़ के
नथनियों में थिरकते हुए मोतियों ने लिये चूम आकर गुलाबी अधर
कनखियों में उलझती हया ने लिखे चिन्ह शब्दों में जितने छुपे राज के

तुलसियों के वनों से उठी गूँज कर बांसुरी की धुनें कुछ भटकते हुए
आपकी पैंजनी से गले जो मिली, नॄत्य करते हुए झनझनाने लगीं

Comments

Shar said…
:)
Shar said…
:)
Udan Tashtari said…
स्वप्न की जो कहानी नयन ने लिखी, चांदनी से धुले रात के पॄष्ठ पर
आज वह आपकी याद को छू गई, गीत बन कर नया गुनगुनाने लगी

-इतना भी पूरा गीत है...बाकी तो बोनस सालिड है..आनन्द आ गया...बस!!!
प्रयुक्त उपमानों का जवाब नहीं। बहुत अच्छी रचना।

***राजीव रंजन प्रसाद
Parul said…
नथनियों में थिरकते हुए मोतियों ने लिये चूम आकर गुलाबी अधर
कनखियों में उलझती हया ने लिखे चिन्ह शब्दों में जितने छुपे राज के

KOMAL..SUNDAR
कुछ सितारे पिघलते हुए रंग में कैनवस को गगन के सजाते रहे
कुछ निखरती हुई ओस में मिल गये, पाटलों को मधुर आ बनातेरहे
नभ की मंदाकिनी में लगा डुबकियाँ, एक नीहारिका खिलखिलाने लगी
राशि के चक्र की आ धुरी पर रुके,रोशनी में ढले जगमगाते रहे

बहुत बढ़िया हमेशा की तरह
mehek said…
bahut sundar jaise alankar aur gehno se saji ho kavita
बहुत बढ़िया !
Manoshi said…
बहुत सुंदर बिंब है...गीत सम्राट। उपमाओं का कितना सुंदर प्रयोग किया है आपने, हमेशा की तरह...
शोभा said…
कुछ सितारे पिघलते हुए रंग में कैनवस को गगन के सजाते रहे
कुछ निखरती हुई ओस में मिल गये, पाटलों को मधुर आ बनातेरहे
नभ की मंदाकिनी में लगा डुबकियाँ, एक नीहारिका खिलखिलाने लगी
राशि के चक्र की आ धुरी पर रुके,रोशनी में ढले जगमगाते रहे

ज्योति के अग्निमय पंथ पर जा खड़े बिन्दु थे ध्यान के स्वर्णवर्णी हुए
दॄष्टि के पारसों का परस जो मिला हर कली ध्यान की मुस्कुराने लगी
वाह बहुत सुन्दर।
Shar said…
"ज्योति के अग्निमय पंथ पर जा खड़े बिन्दु थे ध्यान के स्वर्णवर्णी हुए"
====
"गंध निशिगंध की चूनरी से उड़ी, लिख कथानक गई भोर के पंथ का
====
"बन पथिक आज मौसम चला झूमता, खाई गंगा किनारे की सौगन्ध सा"
====
"तुलसियों के वनों से उठी गूँज कर बांसुरी की धुनें कुछ भटकते हुए"
====
बहुत ही मुश्किल हो जाती है आपके गीतों को पढ के ! comment करते समय किस पंक्ति को उद्धत कर के कहें कि बहुत खूब ! सब कुछ ही बहुत खूब!
काशी है आपका ब्लोग, गीत के जोगियों के लिये !
Jimmy said…
bouth khub ji nice post


Shyari Is Here Visit Jauru Karo Ji

http://www.discobhangra.com/shayari/sad-shayri/

Etc...........
चूड़ियों से छिटकती हुई रश्मियों ने रँगे चित्र आकर नये सांझ के
कंगनों ने खनकते हुए लिख दिये चन्द अध्याय, पायल पे आवाज़ के
नथनियों में थिरकते हुए मोतियों ने लिये चूम आकर गुलाबी अधर
कनखियों में उलझती हया ने लिखे चिन्ह शब्दों में जितने छुपे राज के

तुलसियों के वनों से उठी गूँज कर बांसुरी की धुनें कुछ भटकते हुए
आपकी पैंजनी से गले जो मिली, नॄत्य करते हुए झनझनाने लगीं

kitnaaa khubsurat...!
Anonymous said…
kitni sunder kavita hai!! kahin nazar na lag jaaye. Kala teeka laga ke post kiya karo aisi kavita. Suno, jab kisi sunder kavita pe 13 tippadni dekho toh 14th apne aap de diya karo.
Is baar maine de di hai, par jab tum mera likha nahin padhte ho toh main kyon tumhare blog ka dhyaan rakhoon? 3-4 baar se jyada nahin kareinge hum aisa:)
Ab chillana nahin, anonymous comments kharaab lagte hain toh yeh facility disable kar do. Par jab tak yeh suvidha hai iska 5-6 baar fayda uthaya jaay:) Ha ha 0 0 :)

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