मेरा गीत गुनगुनाओगे

लिख तो देता गीत सुनयने, लेकिन एक बार भी तुमने
कहा नहीं है एक गीत भी मेरा, कभी गुनगुनाओगे

लिखता मैं उतरीं संध्यायें जो आकर खंजन नयनों में
अरुण कपोलों पर आकर जो फ़ूले गुलमोहर महके हैं
सीपी की संतानों ने जो रँगा हुआ है मुस्कानों को
रक्तिम अधरों पर यौवन पा कर जितने पलाश दहके हैं

अभिमंत्रित हो गई कलम जिस रूप सुधा का वर्णन करते
एक बार तुम उस में अपना, बिम्ब एक भी झलकाओगे

लिखता स्वर जो करता प्रेरित मस्जिद से उठानी अजान को
जो बन शंख ध्वनि, मंदिर में करता है मंगला आरती
जो मिश्रित है गिरजों से उठते घंटों के तुमुल नाद में
वह स्वर जिससे सावन की झड़ियां अपना तन हैं निखारती

सरगम को जो दे देता है इक अस्तित्व नया, शतरूपे
उस स्वर को अपना सुर देकर और अधिक कुछ चहकाओगे

लिखता वह कल्पना, शब्द जो बनी बही हर एक कलम से
लिखता जो बन गई अजन्ता, छूकर कूची चित्रकार की
वह जिसकी सांसों में चन्दन के वन,तन में वॄन्दावन है
वह जो एक अनूठी कॄति, छैनी से उपजी निराकार की

लिख दूँ उसके गीत, बँधा है, सकल विश्व जिसकी चितवन से
कह दो तुम मेरे शब्दों को पिरो सांस में महकाओगे

Comments

Udan Tashtari said…
क्या बात है!!! बहुत उम्दा...वैसे आप कहोगे तो आपके गीत तो यूँ भी गुनगुनाते है...गद्य भी गुनगुना दें..लिखिये तो सर जी!! हा हा!!
लिखता वह कल्पना, शब्द जो बनी बही हर एक कलम से
लिखता जो बन गई अजन्ता, छूकर कूची चित्रकार की
वह जिसकी सांसों में चन्दन के वन,तन में वॄन्दावन है
वह जो एक अनूठी कॄति, छैनी से उपजी निराकार की

सुंदर बात कही आपने
Shar said…
"सरगम को जो दे देता है इक अस्तित्व नया, शतरूपे
उस स्वर को अपना सुर देकर और अधिक कुछ चहकाओगे !"
=========
मन्त्र-मुग्ध !
राकेश जी आपके गीतों की प्रशंसा करते करते मेरे शब्‍दकोश में सारे शब्‍द समाप्‍त हो गये हैं सो अब समझ में नहीं आता कि किसी नए गीत को लेकर अब क्‍या प्रशंसा करूं क्‍योंकि प्रशंसा करने के लिये भी तो शब्‍दों की जरूरत होती है ।
लिखता स्वर जो करता प्रेरित मस्जिद से उठानी अजान को
जो बन शंख ध्वनि, मंदिर में करता है मंगला आरती
जो मिश्रित है गिरजों से उठते घंटों के तुमुल नाद में
वह स्वर जिससे सावन की झड़ियां अपना तन हैं निखारती।

बहुत सुनदर पंक्तियाँ हैं, बहुत बहुत बधाई।

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