एक ही आशीष बन कर शब्द हर पल गुनगुनाये

शारदा का हो नहीं आशीष तो संभव कहाँ है
कोई भी अक्षर अधर पर आये,आकर खिलखिलाये

शब्द जितने गुंथ गये हैं मोतियों की माल बनकर
हार में नव गीत के, बस एक उंगली की थिरक से
और पत्थर की लकीरों से खुदे सिल पर समय की
भाव वैसे तो रहे भंगुर, रजतवाले वरक से

एक स्वर जो तार की झंकार स उसकी उठा है
है वही जो रागिनी संध्या सवेरे गुनगुनाये

ओस की जो बूँद उसके श्वेत नीरज से झड़ी है
वह बनी इतिहास रच कर भोजपत्रों पर कथायें
एक अनुकम्पा उसी की बीन से उपजे हुए स्वर
या बने पद सूर के, या संत तुलसी गुनगुनाये

एक उसकी दॄष्टि का अनुग्रह बने सूरज दिवस में
और ढल कर तारकों में रात को वह झिलमिलाये

कंठ में उपजा हुआ स्वर, होंठ पर जो शब्द आते
या कि अक्षर में छुपी रचना जिसे हम जान पाते
है उसी भाषा स्वरा की अक्षरा की देन हमको
अन्यथा है कौन सक्षम जो कभी कुछ गुनगुनाये

शब्द भी वह , है वही सुर और वह ही रागिनी है
गीत में संगीत बन कर एक वह ही झनझनाये

Comments

Dr. Amar Jyoti said…
बहुत सुन्दर!
कविवर श्री राकेश जी, आपकी कविताओँ का सँकलन वास्तव मेँ सूर्य बनकर हिन्दी साहित्याकाश पर दमकेगा यह निस्सँदेहह है ~~
आपको ढेरोँ बधाईयाँ
तथा शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए
अपार हर्ष हो रहा है :)..
सदा माँ सरस्वती की कृपा बनी रहे और कविता की सरस सरिता बहती रहे ..
सादर,
स -स्नेह,
- लावण्या
मीत said…
शब्द भी वह , है वही सुर और वह ही रागिनी है
गीत में संगीत बन कर एक वह ही झनझनाये

नमन कविवर. सुबह का पहला पोस्ट ऐसा हो क्या कहना .....

हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई आप को ..... "............सूरज" को और क्या कहूँ ?
Anonymous said…
माँ शारदा का लाडला तू
पुत्र है , या है पुजारी
नख रंग सकें उनकी प्रभा से
जो चरण बैठें तुम्हारी ।
Anonymous said…
तू ..
तुम्हारी.. ek saath?
Galti ho gayi :)

Maa sharada ke ladale tum...
putr ho, ya ho pujaari ...
Shar said…
माँ की इतनी सुन्दर स्तुति !
गुरूजी, धन्य हैं!
Shar said…
"और पत्थर की लकीरों से खुदे सिल पर समय की
भाव वैसे तो रहे भंगुर , रजतवाले वरक से"
-------------
"ओस की जो बूँद उसके श्वेत नीरज से झड़ी है
वह बनी इतिहास रच कर भोजपत्रों पर कथायें"
------------
अद्भुत उपमा और अलंकार, गुरूजी !
हमेशा की तरह अभीभूत हुआ सर....और "अंधेरी रात का सूरज" के लिये हार्दिक बधाई.ईश्वर करे ये सहस्त्रों एडिशन में जाय.
seema gupta said…
ओस की जो बूँद उसके श्वेत नीरज से झड़ी है
वह बनी इतिहास रच कर भोजपत्रों पर कथायें
एक अनुकम्पा उसी की बीन से उपजे हुए स्वर
या बने पद सूर के, या संत तुलसी गुनगुनाये
' congratulations, and wish you good luck"

Regards
Bilkul sahi kaha aapne, maa saraswati ki kripa ke bina kya kuchh sambhav hai? bilkul nahin, unki kripa se mati apne sthan par rahti hai. aap par maa sharde ki aseem kripa hai aur aisi hi sab par ho yah kamna hai.aapke geet, aapki rachnayen utkrisht star ki hoti hain.main to naya blogger hun, jitna padha achha laga. Abhnav shukla mere ghanisth mitron men se ek hain, aapko bhi jante hain, pata laga, achha laga.
शब्द जितने गुंथ गये हैं मोतियों की माल बनकर
हार में नव गीत के, बस एक उंगली की थिरक से
और पत्थर की लकीरों से खुदे सिल पर समय की
भाव वैसे तो रहे भंगुर,रजतवाले वरक से

बहुत खूब बहुत बहुत बधाई आपको राकेश जी ..
Parul said…
aapkey sabhi geet bol bol kar padhney me badey sundar lagtey hain...pustak ki badhaayii ...
रंजना said…
सर्वप्रथम आपको पुस्तक "अंधेरे का सूरज " के प्रकाशन की अनंत शुभकामनाएं.यह पुस्तक कैसे प्राप्त की जा सकती है कृपया मार्गदर्शन करें,आपके आभारी रहेंगे.

आपकी कृतियाँ सदैव ही मन मुग्ध कर देती हैं.यहाँ जो आपने लिखा है......क्या कहूँ.......माँ शारदा सदा अपने शीतल स्नेह से आप्लावित रखें और ऐसे ही आपसे रचवाती रहें.
वर्तमान में जो काव्य परम्परा में छंदों का लगभग आकाल सा पड़ा दीखता था और मन कचोटता था,माता ने आपसे वह रिक्तता पूर्ण करवा दिया.
शतायु हों और खूब लिखें ताकि हमारा साहित्य समृद्ध हो सके.
बहुत सुंदर माँ वंदना !

Popular posts from this blog

अकेले उतने हैं हम

तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम

बहुत दिनों के बाद