गीत ये कहने लगा है शिल्प में ढलना असम्भव

गीत ये कहने लगा है शिल्प में ढलना असम्भव
देख तुमको शब्दहीना हो ठगा सा रह गया है

एक पल में भूल बैठा अंतरों के अर्थ सारे
है संभल पाता नहीं ले मात्राओं के सहारे
कौन सी उपमा उठा कर कौन सी खूँटी सजाये
कर सके कैसे अलंकॄत भाव जो हैं सकपकाये

चाहता कुछ गा सके पर थरथराते होंठ लेकर
मौन के भुजपाश में बस मौन होकर रह गया है

सोचता है धूप कैसे चाँदनी में आज घोले
रिक्त मिलता कोष है, रह रह उसे कितना टटोले
गंध का जो प्राण, उसको गंध कहना क्या उचित है
अंश के विस्तार में सिमटा हुआ सारा गणित है

कोशिशें कर जो बनाया चित्र कोई बादलों पे
एक झोंके सांस के से वो अचानक बह गया है

रात जिसके शीश पर आ केश बन कर के संवरती
भोर की अरुणाई आ कर नित कपोलों पर मचलती
रागिनी आ सीखती है जिन स्वरों से गुनगुनाना
है कहाँ संभव, उन्हें ले छंद कोई बाँध पाना

गीत का यह भ्रम उसे सामर्थ्य है अभिव्यक्तियों की
एक बालू के घरौंदे के सरीखा ढह गया है

Comments

Dr. Amar Jyoti said…
'अंश के विस्तार में सिमटा हुआ सारा गणित है।'
जीवन की जटिल संरचना का दार्शनिक चित्रण!
बहुत सुंदर।
seema gupta said…
रात जिसके शीश पर आ केश बन कर के संवरती
भोर की अरुणाई आ कर नित कपोलों पर मचलती
रागिनी आ सीखती है जिन स्वरों से गुनगुनाना
है कहाँ संभव, उन्हें ले छंद कोई बाँध पाना
" khubsurtee ka shabd sanyogen ka jvab nahee"

Regards
Anonymous said…
Ati sunder !
Anonymous said…
दोपहर की धूप में
कोई सितारा हठी,चंचल
सूर्य का पा स्पर्श मानो
चित्रवत् सा रह गया है ।

जो कहा वो सुन सका ना
जो सुना वो गुन सका ना
निर्बध मन क्यों पूछ्ता है
कुछ अनकहा सा रह गया है?

गीत को है ये पता क्या
बावरा सा इक अहेरी
रात ही आ कर स्वपन में
बात मन की कह गया है !
श्रद्धेय !
"गीत का यह भ्रम उसे सामर्थ्य है अभिव्यक्तियों
की,एक बालू के घरौंदे के सरीखा ढह गया है "
रचनाकार की विनम्रता, इस गीत की खूबसूरती है !
Anonymous said…
हाँ एक बात और, सुबह से शाम हो गयी तो समझ आया कि बिल्कुल मोनालिसा की तरह है ये कविता । जो देखेगा सोचेगा, उसे देख के मुस्कुरा रही है।
Udan Tashtari said…
यह तो आप हमारी व्यथा कह गये. आपने कैसे जानी-आपको तो यह बात लागू ही नहीँ होती है. कितना स्नेह है आपका कि आप हमारी तकलीफ झट जान जाते हैं. बहुत ही बेहतरीन रचना!!
Ghost Buster said…
फ़िर से बेहतरीन.
एक पल में भूल बैठा अंतरों के अर्थ सारे
है संभल पाता नहीं ले मात्राओं के सहारे
कौन सी उपमा उठा कर कौन सी खूँटी सजाये
कर सके कैसे अलंकॄत भाव जो हैं सकपकाये

....बहुत बहुत शुक्रिया इतनी सुंदर रचनायें एक के बाद एक.और एक नये शब्द से परिचय कराने का भी.
सोचता है धूप कैसे चाँदनी में आज घोले
रिक्त मिलता कोष है, रह रह उसे कितना टटोले
गंध का जो प्राण, उसको गंध कहना क्या उचित है
अंश के विस्तार में सिमटा हुआ सारा गणित है
कोशिशें कर जो बनाया चित्र कोई बादलों पे
एक झोंके सांस के से वो अचानक बह गया है
अह्ह्ह्हा वाह..वाह...क्या गीत है राकेश जी मंत्रमुग्ध कर दिया आपने...बहुत ही खूब.
नीरज
Anonymous said…
naya geet kab likhenge?
Shardula said…
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Shardula said…
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Shardula said…
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