नाम वह एक नि:शेष हो रह गया,

भोर की गुनगुनी धूप ने लिख दिया ओस की बूँद पर स्वर्ण से नाम जो
चेतना को विमोहित किये है रहा रात के और दिन के हर इक याम वो
धड़कनों से जुड़ा, सांस में मिल बहा, राग में रागिनी में बजा है वही
नाम वह एक नि:शेष हो रह गया, और भूला ह्रदय शेष हर नाम को
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ज्ञान की पुस्तकें धर्म के ग्रंथ सब बात हमको यही बस बताते रहे
प्राप्त उनको अभीप्शित हुआ है सदा दीप जो साधना का जलाते रहे
आपका पायें सामीप्य, यह ध्येय है, इसलिये अनुसरण कर कलासाधिके
आपके नाम को मंत्र करते हुए भोर से सांझ तक गुनगुनाते रहे

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जब भी परछाईयाँ आईने में बनीं, आपका चित्र बन झिलमिलाती रहीं
होंठ पर आ थिरकने लगीं सिहरनें, पंखड़ी की तरह थरथराने लगीं
आपकी गंध लेकर हवा जो चली, द्वार मेरे खड़ी गुनगुइनाती रही
पल सभी आपके थे, रहे आपके, धूप आँगन में आई बताती रही

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भोर में नींद के साथ टूटे सपन, रात को फिर से रंगीन हो न सके
पल प्रतीक्षा के सारे रहे मोड़ पर, इसलिये राह को भूल खो न सके
धूप की ठोकरों से गिरे दीप की बाँ को थामने को शिखा न बढ़ी
आपसे दूर हम एक पल क्या हुए फिर निकट आपके और आ न सके

Comments

मीत said…
धूप की ठोकरों से गिरे दीप की बांह को थामने को शिखा न बढ़ी
आपसे दूर हम एक पल क्या हुए फिर निकट आपके और आ न सके
भोर में नींद के साथ टूटे सपन, रात को फिर से रंगीन हो न सके
पल प्रतीक्षा के सारे रहे मोड़ पर, इसलिये राह को भूल खो न सके
धूप की ठोकरों से गिरे दीप की बाँ को थामने को शिखा न बढ़ी
आपसे दूर हम एक पल क्या हुए फिर निकट आपके और आ न सके

बेहतरीन ..दिल को भा गई आपकी यह रचना भी ..
Anil Pusadkar said…
aapki gandh lekar hawa jo chali,dwar mere khadi gungunati rahi............................. sunder rachana
mamta said…
एक और बेहतरीन रचना।
क्या कहूँ राकेश जी...धन्य हैं आप जो ऐसी विलक्षण रचनाएँ रच पाते हैं...
नीरज
हमेशा की तरह सुन्दर ...
सादर नमन ।
Shar said…
Now that was too good a Birthday present for me and I did not even notice !!

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