संभव है सपना सच हो ले

पानी का बुलबुला बनाती, सारे स्वप्न भोर की थपकी
क्या संभव इस बार आंख का कोई तो सपना सच हो ले

पल्लव सभी उड़ा ले जाती बहती हुई हवा पल भर में
तट की सभी संपदा लहरें ले जातीं समेट कर, कर में
चक्रवात के पथ में बचते चिन्ह शेष न निर्माणों के
प्रत्यंचा से बन पाते हैं कब संबंध घने वाणों के

ये सच है. हाँ पर ये भी तो सच है थके हुए पाखी को
है उपलब्ध गग की पूरी सीमा, यदि अपने पर तोले

सीमा नहीं हुआ करती है, यों चाहत के विस्तारों की
रह जाती है एक कहानी बनकर अक्सर अखबारों की
सागर की हर इक सीपी में मोती नहीं मिला करता है
उपवन का हर इक पौधा तो चन्दन नहीं हुआ करता है

लेकिन फिर भी बून्द एक जो छिटकी हुइ किसी ज्योति की
आशान्वित होती है संभव है वह किरण नवेली होले

महका करते हैं गुलदस्ते, अभिलाषा के सांझ सकारे
आकांक्षाओं की चूनरिया लहराती है मन के द्वारे
सतरंगे अबीर सी झिलमिल झिलमिल होती मधुर कल्पना
अगली बार निराशा का हो शायद कोई भी विकल्प ना

कागज़ पर खींची जाती है जो रेखायें बना योजना
संभव है वह उतर पॄष्ठ से सचमुच ही कोई घर हो ले

Comments

Udan Tashtari said…
क्या बात है, बहुत खूब. अब छूट्टी से लौटे है..पूरे रंग में. वाह वाह!! जारी रहिये.
अद्भुत रचना है.
बहुत खूब.
आभार.
mamta said…
कागज़ पर खींची जाती है जो रेखायें बना योजना
संभव है वह उतर पॄष्ठ से सचमुच ही कोई घर हो ले


बहुत अच्छी लगी ये पंक्तियाँ।
Rachna Singh said…
बहुत खूब.
महका करते हैं गुलदस्ते, अभिलाषा के सांझ सकारे
आकांक्षाओं की चूनरिया लहराती है मन के द्वारे
सतरंगे अबीर सी झिलमिल झिलमिल होती मधुर कल्पना
अगली बार निराशा का हो शायद कोई भी विकल्प ना

बेहद खूबसूरत लगी आपकी यह रचना .
राकेश जी
सागर की हर इक सीपी में मोती नहीं मिला करता है
उपवन का हर इक पौधा तो चन्दन नहीं हुआ करता है
भाई वाह...कमाल का लिखा है आप ने इस बार. कितनी खरी बात ...वाह...खूबसूरत अभिव्यक्ति पर ढेरों बधईयाँ.
नीरज

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