साथ नहीं देती परछाईं

जलते हुए दीप को आकर घेरा करते शलभ हमेशा
अँधियारे में साथ न देती पल भर अपनी भी परछाईं

माली बो कर गया बीज तो वापिस नहीं इधर फिर लौटा
और न कोई करने आया कभी निराई कभी गुड़ाई
आग बरसती रही जेठ में, बन कर बाढ़ बहाता सावन
सुख की छांह लिये आँचल में, कोइ बदली इधर न आई

खुली किताबों ने विप्लव के ही विवरण हर बार बताये
लेकिन प्रेम कथाओं वाली बातें कभी नहीं बतलाईं

फूल उगाये थे, काँटे पर, निहित स्वार्थ के उगते आये
धीरज के वटवॄक्षों से आ लिपट गईं विष भरी लतायें
पुरबाई का कोई झोंका आया नहीं इधर सहलाने
रहीं अधूरी हर मौसम में जो अधरों पर सजीं कथायें

व्यर्थ ढूँढ़ते मुस्कानों को आँसू की नगरी में जाकर
कब बहार का झोंका आकर रुकता पतझर की अँगनाई

अँगड़ाई कलियों ने ली तो चंचरीक की लगी कतारें
बनने लगे नीड़ पाखी के जब बौरों ने आँखें खोली
टेर पपीहों की के संग में गाने लगे कोयलें बुलबुल
जिस बागीचे में थी गूँजी नहीं काक की भी कल बोली

चढ़ते हुए दिवस के यौवन का ही साथ निभाता सूरज
ढली सांझ में उसकी सूरत एक बार भी न दिख पाई

Comments

Udan Tashtari said…
क्या बात है, भाई. गजब!! बहुत खूब.
Vivek Gupta said…
अति सुन्दर

Vivek
mailtovivekgupta@gmail.com
Orlando, USA
फूल उगाये थे, काँटे पर, निहित स्वार्थ के उगते आये
धीरज के वटवॄक्षों से आ लिपट गईं विष भरी लतायें
पुरबाई का कोई झोंका आया नहीं इधर सहलाने
रहीं अधूरी हर मौसम में जो अधरों पर सजीं कथायें

बेहद खूबसूरत लिखा है राकेश जी
खुली किताबों ने विप्लव के ही विवरण हर बार बताये
लेकिन प्रेम कथाओं वाली बातें कभी नहीं बतलाईं

आपको पढना एक अनुभव है।

***राजीव रंजन प्रसाद
mamta said…
बेमिसाल !!

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