क्या तुम ही हो

किसकी देहरी छू कर आईं हैं ये चन्दन गंध हवायें
कोई तो हो जो आकर यह बात मुझे बतलाता जाये
कौन प्रणेता है शब्दों का जो अधरों पर मचल रहे हैं
कोई आकर सुर दे दे तो कंठ इन्हें फिर गाता जाये

क्या यह गंध तुम्हारी है प्रिय
क्या यह शब्द रूप का विवरण
क्या तुम ही हो गूँथ गूँथ कर
गजरे, संध्या करती चित्रण
क्या तुम हो जिसकी अंगड़ाई
की देहरी से चली हवायें
क्या तुम ही हो? जिसके कुन्तल
बिखरे तो घिर गईंघटायें

क्या तुम ही हो मुझे बता दो जिसके पग नख के चुम्बन से
नदिया की धारा बन झरना इठलाता बलखाता जाये

कहो तुम्हआरा चित्र नहीं क्या ?
जिसे तूलिका बना रही है
और नहीं क्या राग तुम्हारा
जिसे बांसुरी बजा रही है
कहो निशा के नयन देखते
केवल सपने नहीं तुम्हारे
कहो भोर के निमिष ताकते
नहीं तुम्हारे सिर्फ़ इशारे

कह दो हाँ यह तुम ही तो हो, आ अनंग जिसकी अंगनाई में,
पथ के हर इक कण कण पर अपनी सुधा लुटाता जाये

हां तुम ही हो मनविलासिनी
चित्रकार की मधुर कल्पना
हाँ तुम फ़ागुन-भित्तिचित्र हो
तुम्हीं कार्तिकी सुरच अल्पना
तुम हिमांत की धूप, तुम्ही हो
शरद-चन्द्र की मधुर चन्द्रिका
तुम्ही ज्योति की पंथ प्रदर्शक
तुम्ही दीप की प्राण वर्त्तिका

हाँ तुम ही तो हो पा जिसका एक निमिष सामीप्य मगन हो
पतझड़ भी, पतझड़ में उपवन का हर फूल खिलाता जाये

Comments

Udan Tashtari said…
कौन प्रणेता है शब्दों का जो अधरों पर मचल रहे हैं
कोई आकर सुर दे दे तो कंठ इन्हें फिर गाता जाये


-हाय! क्या बात है, बहुत खूब. लाजबाब, उम्दा! बनाये रहिये.
तुम्हीं कार्तिकी सुरच अल्पना
तुम हिमांत की धूप, तुम्ही हो
शरद-चन्द्र की मधुर चन्द्रिका
तुम्ही ज्योति की पंथ प्रदर्शक
तुम्ही दीप की प्राण वर्त्तिका

बहुत खूब राकेश जी ..मुझे कुछ सूफी सा एहसास हुआ इस रचना में बहुत ही सुंदर लिखी है हर पंक्ति ...लिखते रहे यूं ही :)
______________________________________________________________________________________________________________________________________ ये मेरे मौन का प्रतीक है क्‍योंकि इतनी अच्‍छी कविता को मौन रह कर ही सुना जा सकता है ।
rakhshanda said…
थोडी सी कठिन है पर बहुत सुंदर है, अंदाज़ अलग है.....
शोभा said…
राकेश जी
वाह -
तुम ही हो मनविलासिनी
चित्रकार की मधुर कल्पना
हाँ तुम फ़ागुन-भित्तिचित्र हो
तुम्हीं कार्तिकी सुरच अल्पना
तुम हिमांत की धूप, तुम्ही हो
बहुत सुन्दर कल्पना है।

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