कलम वही जो हर मौसम में

आंधी चीखे, बादल गरजे, कदम कदम पर बढ़ें अंधेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे

यह संकल्प लिया जब हमने अनुष्ठान हमको करना है
तो आड़े आने वाली बाधाओं से फिर क्यों डरना है
मंत्रों के स्वर हमने साधे जिनमें वह अपना ही स्वर है
जो मंतवय हमारा है वह बाकी पूजा से ऊपर है

साक्षी समय, तपस्याओं में आते हैं अवरोध घनेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे

पंथ सही हो, स्वयं लक्ष्य फिर चल कर राही तक आता है
ताल सही हो तो फिर सुर भी स्वत: उमड़ता है गाता है
भ्रम के जालों को किरणों की कैंची सदा छाँट देती है
असमंजस का कोई भी पल ज्यादा देर न रुक पाता है

एक दीप की लौ बोती है, रोज निशा में नये सवेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे

ओ हमराही उठो और नव संकल्पों से आंजुर भर लो
जो कर चुके समर्पण, उनके स्वर को भी अपना स्वर कर लो
देनी है आवाज़, क्षितिज के पार छुपे सूरज को तुमने
थक कर पथ में नहीं रुकोगे,चलो आज यह नूतन प्रण लो

साथ तुम्हारा रहे, कूचियां मेरे भी कुछ चित्र उकेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे

Comments

बहुत ही अच्छा गीत। पढ़ते-पढ़ते मानो गाने लगा मै
रंजू said…
ओ हमराही उठो और नव संकल्पों से आंजुर भर लो
जो कर चुके समर्पण, उनके स्वर को भी अपना स्वर कर लो
देनी है आवाज़, क्षितिज के पार छुपे सूरज को तुमने
थक क्कर पथ में नहीं रुकोगे,चलो आज उअह नूतन प्रण लो

yah geet gaane ka dil hua yahi iski saflata hai ..bahut accha likhte hain aap rakesh ji !
Parul said…
जो मंतवय हमारा है वह बाकी पूजा से ऊपर है
sunadar baat..
अतुल said…
साक्षी समय, तपस्याओं में आते हैं अवरोध घनेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे
यह संकल्प लिया जब हमने अनुष्ठान हमको करना है
तो आड़े आने वाली बाधाओं से फिर क्यों डरना है
मंत्रों के स्वर हमने साधे जिनमें वह अपना ही स्वर है
जो मंतवय हमारा है वह बाकी पूजा से ऊपर है

yathartha

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