Thursday, March 06, 2008

दीप दोनों में रख कर बहाते रहे

प्रार्थन की सभ में लगा हाजिरी, ढोल चिमटे,मजीरे बजाते रहे
फूलमाला,प्रसादी की थाली लिये,परिक्रमा मन्दिरों की लगाते रहे
किन्तु पत्थर न कोई पसीजा कभी, चाल नक्षत्र अपनी बदल न सके
और हम भग्य को दोष देते हुए, दीप दोनों में रख कर बहाते
राहे

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ज्योतिषी ने कहा था हमें एक दिन, हाथ की रेख कहती बनेगा धनी
हाथ पर हाथ रख बैठ हम फिर गये ,खुद चली आयेंगी पास हीरक मणी
आये मौसम,गये, वर्ष बीते बहुत,एक सूखा हुआ फूल भी न मिला
और हम अब भी बैठे प्रतीक्षा लिये,खुद ही खुल जायेगे भाग्य की चटकनी

5 टिप्पणियाँ:

At 5:53 PM, Anonymous mehek said...

bahut badhiya

 
At 6:20 PM, Blogger चंद्रभूषण said...

पहला छंद कविता है, दूसरा तुकबंदी।

 
At 6:35 AM, Blogger Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया...राकेश भाई:

और हम भग्य को दोष देते हुए, दीप दोनों में रख कर बहाते राहे

-बहुत सटीक.

 
At 12:12 PM, Blogger Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया ।
घुघूती बासूती

 
At 8:16 PM, Blogger sunita (shanoo) said...

बहुत सुन्दर...
और हम भाग्य को दोष देते हुए, दीप दोनों में रख कर बहाते रहे...

 

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