Tuesday, January 15, 2008

यादों का मौसम

यों तो मौसम अनगिन आते रहे और बीते
एक तुम्हारी यादों का केवल दिन रात रहा

जब जब चली भोर संध्या में झोंकों भरी हवा
तब तब आई उमड़ तुम्हारी यादों की बदली
-रहा भेजता आमंत्रण पल पल उसको सावन
लेकिन मेरा द्वार छोड़ कर गई नहीं पगली
बुनती रही तितलियों के पंखों पर स्वप्न नये
मीत तुम्हारे तन की गंधें, रंगों में भर कर
सेमल के उड़ते फ़ाहों पर अंकित नाम किया
एक तुम्हारा, उगी चाँदनी की आभा लेकर

एक निमिष भी उसकी चादर, जरा नहीं सिमटी
सूरज की किरणों ने आकर कितनी बार कहा

करे कार्तिक दीपों की अगवानी की बातें
या फ़ागुन खेतों को भेजे सोने के गहने
हरे गलीचे करें तीज का स्वागत पथ बिछकर
आँगन देहरी, रंगबिरंगी राँगोली पहनें
चित्र तुम्हारे ही ओढ़ा करती हैं दीवारें
और अजन्ता एलोरा की गलियाँ बन जातीं
खिड़की की सिल पर आ बैठी एक कोई कोयल
एक तुम्हारे स्वर से उपजा हुआ राग गाती

दिन-दोपहरी, माघ-फूस, जेठों-बैसाखों में
एक यही गतिक्रम है जो सांसों के साथ रहा

घिरे गगन-गंगा के तट पर तारों की छाया
करे चाँदनी चन्दा से या प्यार भरी बातें
बेला फूले, महक लुटाये गमक रातरानी
धुली रोशनी से चमकी हों उजियारी रातें
पल की धड़कन दोहराते बस एक नाम केवल
जिसका है प्रारंभ तुम्ही से, और अंत तुम पर
लहरें, भंवरे, बुलबुल, मैना तारों की सरगम
सब दुहराते, और पपीहा गाता है वह स्वर

मौसम कभी बदल पायेगा जब जब यह सोचा
रेतीले टीलों सा वह भ्रम था, हर बार ढहा

2 टिप्पणियाँ:

At 6:56 AM, Anonymous Anonymous said...

करे कार्तिक दीपों की अगवानी की बातें
या फ़ागुन खेतों को भेजे सोने के गहने
very good.

 
At 11:58 AM, Blogger Parul said...

वाह्……सारे मौसम खिल गये…गुनगुनाने में और भी भला लग रहा है……बहुत सुंदर गीत

 

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