आप
आपकी प्रीत में डूब कर मीत हम, भोर से सांझ तक गुनगुनाते रहे
नैन के पाटलों पर लगे चित्र हम रश्मि की तूलिका से सजाते रहे
आपके होंठ बन कर कलम जड़ गये, नाम जिस पल अधर पर कलासाधिके
वे निमिष स्वर्णमय हो गये दीप से, बन के दीपावली जगमगाते रहे
काव्य का व्याकरण मैने जाना नहीं छंद आकर स्वयं ही संवरते गये
आपकी प्रीत में डूब कर मीत हम, भोर से सांझ तक गुनगुनाते रहे
कुछ ऐसा भी हुआ लिखे जो गीत उन्हें न कोई पढ़ता
जिन गीतों की जनक रही हैं चन्दन-बदनी अभिलाषायें
देहरी से भोर की ले द्वार तक अस्ताचलों के
सावन की पहली बयार का झोंका है या गंध तुम्हारी
आपकी देख परछाईयाँ झील में, चाँदनी रह गयी है ठगी की ठगी
टूट गईं वे चन्दन कलमें, जो चित्रित गीतों को करतीं
एक मुट्ठी में लिये हूं गीत, दूजी में गज़ल है