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Showing posts from July, 2007

ओ पिया ओ पिया

जाने किसके बदन की उड़ी गंध को
पीके झोंका हवा का मचलता हुआ
मेरे सीने से आकर लिपतते हुए
कह रहा, ओ पिया! ओ पिया ! ओ पिया

ताल के मध्य में एक जलकुंड से
सूर्य के बिम्ब की रश्मियां थाम कर
छांह से पत्तियों की फ़िसलते हुए
लिख रहा नाम अपना मेरे नाम पर
उंगलियों से हथेली की रेखाओं में
जाने क्या ढूँढ़, महसूस करता हुआ
इक सुहाना मधुर पल ज्यों अहसास का
अधखुली मुट्ठियों में जकड़ता हुआ

फूल की पांखुरी की किनारी पकड़
पत्र पर बादलों के लगा लिख दिया
ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया

वादियों में शिखर से उतरता हुआ
भोर की घंटियों से उठा जाग के
और पगडंडियों के किनारे खड़ी
दूब को देता संदेश अनुराग के
मलयजी ओढ़नी को लपेटे हुए
ढल रही सांझ जैसा लजाता हुआ
कोयलों के सुरों की पिरो रागिनी
कंठ में अपने, वंशी बजाता हुआ

कसमसाती हुई एक अँगड़ाई सा
बन के पारा मचलता हुआ बह दिया
ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया, ओ पिया

स्वप्न की वीथियों में टपकती हुई
चाँदनी में भिगो पांव धरता हुआ
ओस के पद सी कोमल लिये भावना
मुझको छूते हुए कुछ सिहरता हुआ
गुनगुनाते हुए एक संदेस को
साज की तंत्रियों में पिरोये हुए
वेणियों में संवरते हुए पुष्प की
गंध को, अंक अपने समेटे हुए

भोर के द्वार पर देके आवाज़ फि…

गंध की रागिनी

आपका स्पर्श पा और मदमय हुई
प्रीत पीती हुई जगमगा चाँदनी

आपके पांव छूकर बढ़ा इस तरफ़
संदली एक झोंका महकता हुआ
था अलक्तक के रंगों से भीगा हुआ
इसलिये रंग वादी में भरता हुआ
छेड़ता शाख पर पत्तियों को मचल
एक चुम्बन कली के जड़ा गाल पर
फिर बजाने लगा जलतरंगें मधुर
बाग के बीच बैठे हुए ताल पर

फूल की क्यारियाँ छेड़ने लग गई
गंध की एक मादक मधुर रागिनी

आपके केश से उठ घटा सावनी
छाई अंबर में जब ले के अँगड़ाईयाँ
खुश्बुओं से दिशायें महकने लगीं
गीत गाने लगीं झूम परछाइयाँ
चातकों के हुए स्वप्न साकार सब
सीपियां मौक्त-श्रॄंगार करने लगीं
यज्ञ की भूमि पर एक कदली तरू
से महकती हुई लौ उमड़ने लगी

वेद की कुछ ॠचायें लगीं झूमने
आपके कंठ की हो के अनुगामिनी

आपकी उठ गई जो पलक तो छिटक
कर गिरी, गुनगुनी धूप दालान में
जितने साये खड़े बुर्जियों पर छुपे
गुम हुए वे सभी अपनी पहचान में
बात दीवार से चौक करने लगा
खिड़कियाँ झाँक कर देखती रह गईं
पौलियां देहरी, खनखनाते हुए
बात गलियों के कानों में कहती रहीं

ईर्ष्या से जली, आपको देखकर
खोल नभ के झरोखे, चपल दामिनी

आपके मुख से दीपित हुई जो निशा
रात पूनम की जैसे लगा आ गई
आपकी चूनरी जो हवा में उड़ी
तो गगन पर सितारों की रुत छा गई
तैरने …

अस्मिता खो गई

रोशनी दायरों में पिघलने लगी
चाँदनी आयेगी, ये न निश्चित हुआ, दस्तकें तट पे दे धार हँसने लगी

टिमटिमाते हुए कुमकुमों से झरे
जुगनुओं के महज पंख टूटे हुए
फ़ुनगियों के लटकते रहे शाख से
साये जो दोपहर के थे छूटे हुए
दलदली घास अँगड़ाई लेती रही
कोई आये उठाने उसे सेज से
आस के स्वप्न तैरा किये आँख की
झील में,बिम्ब से एंठ रूठे हुए

सांझ के केश बिखरे, घनी स्याहियां बून्द बन कर गगन से बरसने लगीं
रोशनी दायरों में पिघलने लगी

पत्र ने सरसराते हुए कुछ कहा,
जब इधर से गया एक झोंका मगन
गुलमोहर ने लुटाया उसे फूल पर
थी पिरोकर रखी ढेर उर में अगन
पारिजातों की कलियों ने आवाज़ दे
भेद अपना बताया है कचनार को
चांदनी कैद फिर भी रही रात भर
चांद से न उड़े बादलों के कफ़न

एक कंदील थी जो निशा के नयन में किरन बन गयी, फिर चमकने लगी
रोशनी दायरों में पिघलने लगी

बढ़ रहे मौन के शोर में खो गयी
गुनगुनाती हुई एक निस्तब्धता
पल सभी मोड़ पर दूर ठहरे रहे
ओढ़ कर एक मासूम सी व्यस्तता
रात की छिरछिरी ओढ़नी से गिरा
हर सितारा टँगा जो हुआ, टूट कर
अपनी पहचान को ढूँढ़ती खो गई
राह में आ भटकती हुई अस्मिता

ओढ़ मायूसियों को उदासी घनी, आस पर बन मुलम्मा संवरने लगी
रोशनी दायरों में पिघलने लगी

उन गीतों को गाऊं क्योंकर

तुमने जिनको स्वर न दिया, उन गीतों को मैं गाऊं क्योंकर

छन्दों की थाली में मैने अक्षर अक्षर पुष्प संवारे
भावों का जलकलश लिये, आराध्य देव के पांव पखारे
लिये भावनाओं के कुंकुम अक्षत से श्रॄंगार किया है
धड़कन को कर दीप, द्वार पर बिखराये मैने उजियरे

किन्तु झरी पांखुर वाले हैं सुमन, शब्द मात्राओं के बिन
मुरझाये फूलों को पिय के फिर मैं पांव चढ़ाऊं क्योंकर


अभिमंत्रित करके सपनों को सौगंधों के गंगाजल से
पलकों पर टांका, सज्जित कर सुरभित संध्या के काजल से
अभिलाषा की वेणी में गूंथे आशा के कई सितारे
जो उधार लेकर आया था रजनी के झीने आंचल से

किन्तु स्वरों की पायल ने जब सब अनुबन्धन तोड़ दिये हैं
तुम्ही कहो झंकॄत घुंघरू सा मैं आखिर बन जाऊं क्योंकर


भोजपत्र पर लिखी कथाओं को फिर फिर मैने दोहराया
चित्रित एक अजंता को मैं सुधियों में भर भर कर लाया
मीनाक्षी,कोणार्क,पुरी के शिल्पों की अभिव्यक्ति चुरा कर
अनुभूति के रामेश्वर पर फिर मैने अभिषेक चढ़ाया

पर हर पल बिखरा, झंझा में ध्वंस हुए ता्शों के घर सा
तुम्हीं बताओ फिर खंडहर पर नव निर्मान बनाऊँ क्योंकर ??

गीत बनने से पहले बिखरते रहे

आपका ये तकाजा लिखूँ गीत मैं
छंद बनने से पहले बिखरते रहे

अक्षरों के लगा पंख उड़ न सके
भाव बैठे थे अनुभूति की शाख पर
मन की खिड़की पे लटकी हुईं चिलमनें
देख पाये न बाहर तनिक झांक कर
ज्यों गिरा नैन बिन, नैन वाणी बिना
भाव शब्दों बिना, शब्द भावों कटे
एक जुट हो कभी वाक्य बन न सके
शब्द सारे रहे हैं गुटों में बँटे

और अभिव्यक्तियों के निमिष, आँख की
कोर पर आये, आकर पिघलते रहे

शब्द को चूमने को हुई आतुरा
लेखनी पॄष्ठ के पंथ पर है खड़ी
भावनाओं की परवाज को बाँध कर
झनझनाती है बिखराव की हथकड़ी
जो अलंकार हैं उनको आवारगी
ले गई साथ अपने कहीं दूर ही
उठ न पाई है बिस्तर से उपमा कोई
साँझ आलस से थक कर हुई चूर थी

दंश तीखे दिये जा रही व्याकरण
जोकि सीधे ह्रदय में उतरते रहे

फिर ये सोचा लिखूँ, नाव, नदिया कमल
फूल जूही के साया अमलतास का
रंग सिन्दूर का, स्वर्ण प्राची के पल
और सम्बन्ध आशा से विश्वास का
गागरी भर तॄषा, आंजुरि तॄप्ति को
प्रीतमय दॄष्टि की अनवरत साधना
डूब ॠतुगंध में मुस्कुराती हुइ
गुनगुनाती हुई एक शुभकामना

पर कलम की गली पूर्ण निर्जन रही
रेत के बस बगूले उमड़ते रहे

लिख न पाया तो सोचा कि गाऊं मैं, मन
की अंधेरी गुफ़ाओं की आवाज़ को
सरगमों के रुदन को जो …