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Showing posts from March, 2007

हम किसको परिचित कह पाते

हम अधरों पर छंद गीत के गज़लों के अशआर लिये हैं
स्वर न तुम्हारा मिला, इन्हें हम गाते भी तो कैसे गाते

अक्षर की कलियां चुन चुन कर पिरो रखी शब्दों की माला
भावों की कोमल अँगड़ाई से उसको सुरभित कर डाला
वनफूलों की मोहक छवियों वाली मलयज के टाँके से
पिघल रही पुरबा की मस्ती को पाँखुर पाँखुर में ढाला

स्वर के बिना गीत है लेकिन, बुझे हुए दीपक के जैसा
हम अपने आराधित का क्या पूजन क्या अर्चन कर पाते

नयन पालकी में आ बैठे, चित्र एक जो बन दुल्हनिया
मन के सिन्धु तीर पर गूँजे, जिसके पांवों की पैंजनियां
नभ की मंदाकिनियों में जो चमक रहे शत अरब सितारे
लालायित हों बँधें ओढ़नी जिसकी, बन हीरे की कनियां

यादों के अंधियारे तहखानों की उतर सीढ़ियां देखा
कोई ऐसी किरन नहीं थी, हम जिसको परिचित कह पाते

साँसों की शहनाई की सरगम में गूँजा नाम एक ही
जीवन के हर पथ का भी गंतव्य रहा है नाम एक ही
एक ध्येय है , एक बिन्दु है, एक वही बन गया अस्मिता
प्राण बाँसुरी को अभिलाषित, रहा अधर जो स्पर्श श्याम ही

जर्जर, धूल धूसरित देवालय की इक खंडित प्रतिमा में
प्राण प्रतिष्ठित नहीं जानते, उम्र बिताई अर्घ्य चढ़ाते

सपनों की परिणति, लहरों का जैसे हो तट से टकराना
टूटे हु…

अनुत्तरित प्रश्न

जो अनुत्तरित रहा अभी तक, तुमने फिर वह प्रश्न किया है
अब मैं उत्तर की तलाश में निशि दिन प्रश्न बना फिरता हूँ

क्या है उचित और अबुचित क्या, फ़िक्र किये बिन देखे सपने
सपने लेकिन सपने ही थे, निमिष मात्र भी हुए न अपने
दिवा स्वप्न की उम्र न पल भर, बनने से ही पूर्व बिगड़ते
धुंधले सभी, नयन पाटल पर किसी चित्र में पाये न ढलने

आँखों के मरुथल को अब तो आदत हुई शुष्क रहने की
आँसू कोई तिरे न, इससे पलक झपकते भी डरता हूँ

दीपक की अभिशापित लौ में पिघल गईं मेरी संध्यायें
आवारा गलियों में भटकीं चन्दा वाली सभी निशायें
पूजा में झुलसे यौवन के बनजारे यायावर पग को
मंज़िल का पथ दिखलाने में अब तक असफ़ल रहीं दिशायें

कुंभकार के चाक रखे हैं मेरे दिवस मॄत्तिका जैसे
जैसे कोई अंगूठे चाहें, वैसे शिल्पों में गढ़ता हूँ

भरते हुए शून्य अंतर में छलना खनका रही चूड़ियाँ
और बढ़ाती हुई भावनाओं से मन के मध्य दूरियाँ
सम्बन्धों की रीती गठरी रह रह याद दिला जाती है
किस पूँजी की बातें करती थीं बचपन में बड़ी बूढ़ियाँ

अस्ताचल के सिन्धु तीर पर खड़ा देख ढलते सूरज को
लौट सकेगा क्या कल फिर यह, रह रह कर सोचा करता हूँ

नये संवत की शुभकामनायें

झील की लहरों पर बिखरता है स्वर्ण
पत्तों पर छा रहा नया नया वर्ण
अँगड़ाई लेते हैं कोयल के गीत
अलगोजे छेड़ रहे मधुरिम संगीत
आँगन में उतर रही सोनहली धूप
संध्या के दर्पण में नया नया रूप
पुरबा की चूनर में मलयज की शान
कलियों के चेहरों पर आई मुस्कान
पगडंडी है लदी हुई गाड़ियों भरी
सरसों की दुल्हन अब पालकी चढ़ी
निशिगंधा खोल रही महकों के द्वार
खुनक भरे मौसम में डूबा घरबार
भरा प्रेम पत्रों से मेंहदी ने हाथ
छत ने की आँगन से मीठी सी बात
ठिठुरन पर आज चढ़ा देखिये बुखार
चैती इस पड़वा ने खड़काया द्वार.
नव संवत की शुभकामनायें

शंख ने गूँज कर शब्द नभ पर लिखा

एक अंकुर हुआ भोर का प्रस्फ़ुटित
यों लगा ये धरा जगमगाने लगी

रात को पी गई एक उजली किरन
इक नये रंग में ढल उषा सज गई
पंछियों ने कहा मुस्कुराते हुए
चांद ने बात जो थी दिशा से कही
झील में से उमड़ता हुआ, नीर को,
सूर्य, पिघला हुआ स्वर्ण करता हुआ
और दिन का टँगे कैनवस पर नया
चित्र रंगों में सजता सँवरता हुआ

खेत ने था पुकारा, महज इसलिये
पायलें गीत पथ को सुनाने लगीं

फूल की पांखुरी पर थिरकती हुई
रात भर जो पिघल कर बही चाँदनी
सातरंगी लिये तूलिका लिख रही
मलयजी गंध की इक मधुर रागिनी
घाट वाराणसी के सजग हो उठे
मंत्र के शब्द जीवंत करते हुए
और उन्नत ललाटों पे अंकित हुए
रोलियाँ और चंदन निखरते हुए

आरती, प्रज्वलित दीप की ज्योति के
राग के साथ स्वर को मिलानेलगी

शंख ने गूँज कर शब्द नभ पर लिखा
पट खुले मंदिरों के महाकाल के
कोशिशों में अगरबत्तियां-धूप हैं
लेख विधना के बदलें लिखे भाल के
उठ अजानें चलीं एक मीनार से
चर्च से सरगमें घंटियों की बहीं
ग्रंथसाहिब से उठती गुरुवाणियों
से सुगन्धित हुई नवदिवस की कली

आस्थायें जगी लेके संकल्प को
अपनी अँगनाई रसमय बनाने लगीं

ग्रहण कोई लग न पाये

अर्चना की दीप तो तूने जलाया है उपासक
देखना अब वर्तिका पर ग्रहन कोई लग न पाये

प्राथमिक उपलब्धियों को ध्येय मत कर साधना का
जान ले तू मन लुभाती हैं हज़ारों व्यंजनायें
ध्यान विश्वामित्र होकर, केन्द्रित जब जब हुआ है
भंग करने को तपस्या, आईं तब तब मेनकायें

आहुति को आँजुरि में धड़कनों का भर हविष तू
तब सुनिश्चित साधना का साध्य तेरे पास आये

मिल रहा है जो प्रथम आव्हान पर तुझको पुजारी
है नहीं वह, साधना जिसके लिये तूने संवारी
कर स्वयं को ही हविष,तब ही चढ़ेगा अग्नि रथ पर
और पाये, कामना जिसके लिये रह रह पुकारी

लेखनी विधि की करे हस्ताक्षर तब शीश तेरे
और तू बन कर सितारा ध्रुव सरीखा जगमगाये

शीश पर तेरे सजा है जो मुकुट, केवल क्षणिक है
याचकों की बाध्यता ही प्रप्ति के पथ की बधिक है
यज्ञ करता पूर्ण जो भी है अधूरापन तपस्वी
मान ले पथ में सदा उपलब्धि से बाधा अधिक है

धैर्य रख कर एक ही पथ पर चलाचल ओ पथिक तू
हो नहीं विश्वास क्षय, चाहे समय नित आजमाये

ढाई अक्षर दूर

भटक गया हरकारा बादल, भ्रमित कहाँ, मैं सोच रहा
मेरे घर से ढाई अक्षर दूर तुम्हारा गांव है

मेघदूत को बाँधा है मैने कुछ नूतन अनुबन्धों में
और पठाये हैं सन्देशे सब, बून्दों वाले छंदों में
जो मधुपों ने कहे कली से उसकी पहली अँगड़ाई पर,
वे सबके सब शब्द पिरो कर भेजे मैने सौगंधों में

किन्तु गगन के गलियारे में नीरवता फ़ैली मीलों तक
नहीं दिखाई दे बादल की मुट्ठी भर भी छांव है

सावन की तीजों में मैने रसगंधों को संजो संजो कर
मदन शरों से झरते कण को हर अक्षर में पिरो पिरो कर
गन्धर्वों के गान, अप्सराओं की झंकॄत पैंजनियों में
से उमड़े स्वर में भेजा है, उद्गारों को डुबो डुबो कर

चला मेरे घर से भुजपाशों में भर कर मेरे भावों को
और कहा पूरे रस्ते में नहीं उसे कुछ काम है

पनघट ने गागर भर भर कर, मधुरस से सन्देशे सींचे
सूरज ने ले किरण , किनारी पर रंगीन चित्र थे खींचे
केसर की क्यारी में करती अठखेली जो चंचल पुरबा
करते हुए अनुसरण उनका साथ चली थी पीछे पीछे

बादल अगर नहीं भी लाये, तुम्हें विदित है सन्देशों में
लिखा हुआ है, अन्तर्मन में लिखा तुम्हारा नाम है

रात ने जो बाँसुरी छेड़ी

रागिनी उल्लास के रह रह सुमन चुनने लगी है
रात ने जो बाँसुरी छेड़ी सुबह सुनने लगी है

प्रीत होकर मलयजी अब स्वप्न करती है सुनहरे
यामिनी-गंधा कली देती निरंतर द्वार फेरे
हर दिशा उमगी हुई है आस के अंकुर उपजते
और अंकित कर बहारों को हवा के साथ चलते

फिर बनी तारा चकोरी चाँद का दर्पण उठा कर
नयन में अपने रुपहरी स्वप्न फिर बुनने लगी है

पाटलों पर ले रही अँगड़ाइयाँ अब ओस आकर
रश्मियों को चूमती है स्वर्ण निर्झर में नहा कर
पाखियों के पंख से उड़ते हुए झोंके हवा के
झर रहे हैं पेड़ की शाखाओं से वे गुनगुनाते

आरती में गूँजती सारंगियों की तान लेकर
मुस्कुराहट की गली से धुन नई उठने लगी है

बिछ रही हैं पंथ में दरियां नये आमंत्रणों की
वाटिकाओं ने मधुप के साथ जो भेजे कणों की
टेरती है गुनगुनी सी धूप बासंती बहारें
झील को दर्पण बना कर रूप को अपने निहारें

उंगलियाँ थामे किसी ॠतुगंध वाली भूमिका की
यह शिशिर की पालकी अब द्वार से उठने लगी है.

बिना शीर्षक

जिसकी सुंदरता का वर्णन शब्दों में सिमट नहीं पाता
वाणी असमर्थ रही कहने में जिस चिर यौवन की गाथा
प्रकॄति ने अपना रूप पूर्ण जिस प्रतिमा में साकार किया
शतरूपे हर इक कविता में तुमसे ही काव्य उपज पाता

-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-



उर्वशी ने कर दिये हस्ताक्षर जिसके अधर पर

और सम्मोहन सिखाया मेनका ने ही स्वयं हो

बान्ध कर नूपुर पगों में नॄत्य रम्भा ने सिखाया

एक कवि की कल्पना की कल्पना शायद तुम्ही हो.

होली

पीले टेसू खिले पीली सरसों हँसी,गुनगुना चूनरी और धानी हुई
ओढ़ सिन्दूर सन्ध्या लजाने लगी,मुस्कुराती दुपहर आसमानी हुई
चूड़ियां लाल पहने उषा की दुल्हनआँज काजल निशा होती खंजननयन
रंग होलीके बिखरे हैं चारों तरफ़, यों लगा हैप्रकॄति भी दिवानी हुई

होली के अवसर पर अनन्य शुभकामनायें

बदमिजाज की चन्द हवायें

ये जो गली मोहल्ले में हैं बदमिजाज की चन्द हवायें
आओ उनको कहें रँगें वे, अब होली के रंगों में

शब्दों के जो तीर बींधते इक दूजे को सीने में
उनको फूल बना बरसायें , अब फ़ागुनी उमंगों में

उड़ने दो गुलाल रंगों में रँगें अबीरों के बादल
थाप ढोल की घुलती जाये झूम झूम कर चंगों में

गलियों से गलियों का नाता, कब दीवारों से टूटा
किसको हासिल कभी हुआ कुछ, चौराहों के दंगों में

ये कपोत जो उड़े गगन पर आज, शहादत देते हैं
हमने उमर गुजारी अपनी, धार मापते खंगों में

काबे में हो या हो फिर वह गिरजे की दहलीजों का
नजर नजर में फ़र्क भले हो, फ़र्क नहीं है संगों में