Posts

Showing posts from January, 2007

आदमी से बनाया हमे झुनझुना

अपने गुलदान में रोज उम्मेद के फूल लाकर नये हम सजाते रहे
सांझ के साथ झरती रहीं पांखुरी, चाह की मैय्यतें हम उठाते रहे

आफ़ताबों के झोले में मिल न सकी, मेरी तन्हाई शब को कोई भी सहर
माहताबों से हासिल न कुछ हो सका, जुगनुओं की तरह टिमटिमाते रहे

बिक रहे हम सियासत की दूकान में, चंद श्लोक हैं, चार छह आयतें
जिसको जैसी जरूरत हमारी रही, दाम वैसे ही आकर लगाते रहे

कोई बाकी नहीं जो फ़रक कर सके कौन खोटा यहां है, खरा कौन है
मांग सिक्कों की बढ़ती रही इसलिये जो मिला सामने वो चलाते रहे

जिनको हमने बनाया हुआ रहनुमा, आज फ़ितरत उन्ही की बदलने लगी
आदमी से बनाया हमें झुनझुना, जब भी चाहा हमें वे बजाते रहे

मैं प्रतीक्षित-कोई तो हो

आँजुरि में जल भरे अक्षत लिये , मैं हूँ प्रतीक्षित
कोई आकर मंत्र बोले और मैं संकल्प लूँ नव

शर्मग्रंथों में लिखीं जो आचरण की संहितायें
अर्थ जिनके दे उदाहरण जो हमें आकर बतायें
योगक्षेमं वासुधैव<. शब्द से होते परे हैं
सत्य का विस्तार होता, सार्थक जो कर बतायें

वे पुरोहित मिल सकें यदे एक दिन भागीरथी तट
तो निमिष के आव्हानों पर लुटा दूँ कल्प मैं अब

कोई हो जिसने कभी हो नीतियों का अर्थ आँका
शांति क्या केवल कबूतर, पत्तियों की एक शाखा
व्याकरण, निरपेक्षता का जो कभी समझा सका हो
और माने पुत्र मानव है उसी बस एक मां का

वो अगर वामन मिले, मैं बन बलि निर्वास ले लूँ
धड़कनों की रागिनी के तार को विस्तार दूँ तब

जानता हूँ स्वप्न सारे शिल्प में ढलते नहीं हैं
यज्ञ-मंडप में सजें जो पुष्प नित खिलते नहीं हैं
कल्प के उपरांत ही योगेश्वरों को सॄष्टि देती
औ' उपासक को सदा आराध्य भी मिलते नहीं हैं

किन्तु फिर भी मैं खड़ा हूँ, दीप दोनों में सजा कर
कोई तो आगे बढ़ेगा, आज मैं आवाज़ दूँ जब

चढ़ रही उमर के

संभल संभल जब उठते हैं पग, अमराई की राहगुजर पे
अरे रूपसि ! निश्चित मानो, लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

धुंधली आकॄतियों के बिम्बों में मन उलझ उलझ जाता है
एक अधूरा छंद अधर पर पाहुन बन बन कर आता है
अभिलाषा की हर अँगड़ाई टूट टूट कर रह जाती है
निमिष मात्र भी एक बिन्दु पर ध्यान नहीं रुकने पाता है

हर इक सांझ लिये आती है बाँहों में सपने भर भर के
अरी वावली ! ध्यान रहे ये लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

अनजाने ही खिंच आती हैं चेहरे पर रेखायें लाज की
गडमड होकर रह जाती हैं, बातें कल की और आज की
फूलों की पांखुर को करते, आमंत्रित पुस्तक के पन्ने
मन को करती हैं आलोड़ित ,बात रीत की औ; रिवाज की

मीठी मीठी बातें करने लगें रंग जब गुलमोहर के
सुनो रुपसि ! याद रहे, यह लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

मन को भाने लगती हैं जब इतिहासों की प्रेम कथायें
चैती के आंगन में आकर सावन की मल्हारें गायें
पुरबाई के झोंके भर दें रोम रोम में जब शिंजिनियां
सात रंग पलकों की देहरी पर आकर अल्पना बनायें

आतुर हों जूड़े में सजने को जब फूल उतर अंबर के
रूपगर्विते ! मानो तुम ये लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

ओ अपरिचित ! आओ हम तुम

वर्त्तिका के प्राण के उत्सर्ग की पहली कहानी
ज्योति की अँगड़ाइयों में दीप की ढलती जवानी
मैं अगर गाऊँ नहीं तो कौन इनको शब्द देगा
और फिर दोहराई जायेगी वही गाथा पुरानी

तो अपरिचित ! आओ हम तुम शब्द से परिचय बढ़ायें
कुछ कहो तुम, कुछ कहूँ मैं, साथ मिल कर गीत गायें

अर्चना के मंत्र में जो गूँजता है वह प्रथम स्वर
साधना के केन्द्र के आव्हान का जो प्रथम अक्षर
जोड़ता जो एक धागा है, उपासक से उपासित
प्रीत की आराधना का एक जो है चन्द्रशेखर

इन सभी की बाँह को थामे हुए आगे बढ़ें हम
जा रही हैं जो गगन तक, सीढ़ियों पर पग उठायें

यज्ञ में संकल्प के जल से भरी वह एक आंजुर
देवता के पांव चूमे फूल की जो एक पांखुर
नॄत्य में देवांगना के झनझनाता एक घुंघरू
रास को आवाज़ देती कुंज की वह एक बांसुर

कर गये प्रारंभ जो आधार की रख कर शिलायें
आओ उन पर हम नये प्रासाद मिल जुल कर बनायें

एक को आवाज़ दें हम, दूसरे को बीन लायें
शब्द यों क्रमबद्ध करके होंठ पर अपने सजायें
तार की आलोड़ना में मुस्कुराती सरगमों को
रागिनी में हम पिरोकर,स्वर संवारें गुनगुनायें

हैं क्षितिज के पार जो संभावनायें चीन्ह लें हम
और उनसे ज्योर्तिमय कर लें सभी अपनी दिशायें

ओ अपरिचित आओ हम तिम शब…

घुल रही आस्था आज विश्वास में

ताल में ज्यों कमल पत्र पर से फिसल
ओस की बून्द लहरें जगाने लगी
नाम तेरे ने मेरे छुए जो अधर
सरगमें बज उठी हैं मेरी सांस में

बज रही आरती में बँधा शब्द हर
इक जुड़ा है हुआ एक ही नाम से
रंग भरती रही भोर तक है निशा
एक ही चित्र में सुरमई शाम से
एक ही गंध को भर के भुजपाश में
संदली ये हवा लेती अँगड़ाईयां
एक नूपुर की झंकार को थाम कर
गुनगुनाती रही रोज अँगनाईयां

एक आकार वह, स्वप्न से मूर्त हो
आ गया है अचानक मेरे पास में

बादलों के कहारों के कांधे चढ़ी
आई भूली हुई याद की पालकी
रूप की धूप में जगमगाती हुई
एक बिंदिया चमकती हुई भाल की
झीना परदा उड़ा एक पल के लिये
जागने लग पड़ी है मधुर भावना
प्रीत लिखने लगी है ह्रदय पर नये
एक अध्याय की आज प्रस्तावना

भाव के निर्झरों से उमड़ती हुई
आस्था घुल रही आज विश्वास में

रश्मियों से गुंथी गंध की वेणियां
इन्द्रधनुषी रँगे पंख मधुकीट के
कुन्तलों में मचलती हवा पूरबा
स्वप्न साकार करती है मन ढीठ के
पुष्पराजों की अँगड़ाईयों से अधर
जब खुले तो सुधा की बही जान्हवी
हो गईं एक पल में तिरोहित सभी
जो सुलगती हुई प्राण में प्यास थी

चित्र जब से तेरे, पाटलों पर बने
रात दिन ढल गये, मेरे, मधुमास में



चाँदनी एक दिन

बन के दुल्हन हमारी गली में रही मुस्कुराती हुई चाँदनी एक दिन
चूमती थी अधर आ के मुस्कान की गुनगुनाती हुई रागिनी एक दिन

आज यादों की सुलगीं अगरबत्तियां, गंध में डूब तन मन नहाने लगा
चित्र अनुभूतियों के प्रथम पॄष्ठ का, सामने आ गया झिलमिलाने लगा
इक अबीरी छुअन, जैसे बिल्लौर की, प्यालियों में भरी छलछलाने लगी
बांसुरी की धुनों की पकड़ उंगलियां गीत लहरों का कोई सुनाने लगा

थी शिराओं में अँगड़ाई लेती हुई, कसमसाती हुई दामिनी एक दिन
चूमती थी अधर आके मुस्कान की गुनगुनाती हुई रागिनी एक दिन

फिर चमेली की परछाइयों में घुली भोर, निशिगंध को पी महकने लगी
स्वर्ण पत्रों से छनती हुईं रश्मियां, मन के रजताभ पट पर चमकने लगी
एक नटखट हवाओं का झोंका कोई, कान में आके कुछ कुछ सुनाने लगा
सांझ के पात्र में ओस भरती हुई, पूर्णिमा ज्यों सुधा बन टपकने लगी

कल्पना, बन क्षितिज पर संवरती रही खिलखिलाती हुई कामिनी एक दिन
बन के दुल्हन हमारी गली में रही मुस्कुराती हुई चाँदनी एक दिन

करवटें ले रहे आज वयसंधि के मोड़ पर जो उगे भाव अनुराग के
हीरकनियों के पंखों जड़े हैं सपन भावनाओं के रंगीन विश्वास के
एक चाँदी के वरकों सरीखी अगन लेती अँगड़ाई सुधियों की अँगनाई…

मंज़िल नहीं है

राजपद पर कर दिया आसीन तुमको आज सब ने
भूलना तुमको नहीं है, सिर्फ़ ये मंज़िल नहीं है

है क्षणिक विश्राम का पल, फिर उठो पाथेय बांधो
खोलने तुमको नये आयाम प्राची के परे जा
तोड़ कर सीमा क्षितिज की फिर उगाने नव उजाले
सूर्य से कितनी अपेक्षा राह को रोशन करे वो

जो तुम्हारे हाथ से दो चार उंगली दूर पर है
हो विदित तुमको, वही है ध्येय औ पाना वही है

जानते हो कोष संचित साथ न देता सदा ही
एक भ्रम ही है भुलावा जो सदा देता रहा है
जो मुलाम्मे में छुपा है ध्यान उसकी ओर दो तुम
जीतता है वह, स्वयं को जान जो लेता रहा है

राजपद के राजपथ का पग प्रथम विस्मॄत न करना
नीड़ को पाथेय कर के पग बढ़ाना ही सही है

बिम्ब दर्पण के सुखद लगते मगर आकार धूमिल
फूल कागज़ के न देते गंध रहते हों भले खिल
बीज बो तुमको अषाढ़ी मेघ करने भाद्रपद के
है तभी संभव बनेगी राह खुद ही एक मंज़िल

आज की ऊँचाई से, आकाश को भर लो भुजा में
आस की बहती हवा ये आज तुमसे कह रही है

छलके शब्दों की गागरिया

छलक रही शब्दों की गागर
संध्या भोर और निशि-वासर
दोहे, मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद
घुलने लगा कंठ में सुरभित पुष्पों का मकरंद

भरने लगा आंजुरि मे अनुभूति का गंगाजल
लगा लिपटने संध्या से आ मॆंहदी का आँचल
ऊसर वाले फूलों में ले खुश्बू अँगड़ाई
मरुथल के पनघट पर बरसा सावन का बादल

करने लगी बयारें, पत्रों से नूतन अनुबंध
दोहे मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद

लहराई वादी में यादों की चूनर धानी
नदिया लगी उछलने तट पर होकर दीवानी
सुर से बँधी पपीहे के बौराई अमराई
हुए वावले गुलमोहर अब करते मनमानी

वन-उपवन में अमलतास की भटकन है स्वच्छंद
घुलने लगा कंठ में सुरभित पुष्पों का मकरंद

रसिये गाने लगीं मत्त भादों की मल्हारें
अँगनाई से हंस हंस बातें करतीं दीवारें
रंग लाज का नॄत्य करे आरक्त कपोलों पर
स्वयं रूठ कर स्वयं मनायें खुद को मनुहारें

एक एक कर लगे टूटने मन के सब प्रतिबंध
दोहे मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद