Thursday, December 27, 2007

अंतिम गीत

विदित नहीं लेखनी उंगलियों का कल साथ निभाये कितना
इसीलिये मैं आज बरस का अंतिम गीत लिखे जाता हूँ

चुकते हुए दिनों के संग संग
आज भावनायें भी चुक लीं
ढलते हुए दिवस की हर इक
रश्मि, चिरागों जैसे बुझ ली
लगी टिमटिमाने दीपक की
लौ रह रह कर उठते गिरते
और भाव की जो अँगड़ाई थी,
उठने से पहले रुक ली

पता नहीं कल नींद नैन के कितनी देर रहे आँगन में
इसीलिये बस एक स्वप्न आँखों में और बुने जाता हूँ

लगता नहीं नीड़ तक पहुँचें,
क्षमता शेष बची पांवों में
चौपालें सारी निर्जन हैं
अब इन उजड़ चुके गांवों में
टूटे हुए पंख की सीमा
में न सिमट पातीं परवाज़ें
घुली हुई है परछाईं ,
नंगे करील की अब छांहों में

पता नहीं कल नीड़ पंथ को दे पाथेय नहीं अथवा दे
इसीलिये मैं आज राह का अंतिम मील चले जाता हूँ

गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
सुधि के दर्पण में न दरारें पड़ें,
कौन यह कह सकता है ?
जितना है विस्तार ह्रदय का आज,
भला उतना कल भी हो ?

पता नहीं कल धूप, गगन की चादर को कितना उजियारे
इसीलिये मैं आज चाँद को करके दीप धरे जाता हूँ

5 टिप्पणियाँ:

At 10:56 AM, Blogger सजीव सारथी said...

waah .... shabd kam padh jaate hain tareef ke liye guruvar

 
At 1:36 PM, Blogger नीरज गोस्वामी said...

गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
वाह ...वाह...वाह...राकेश जी शब्द और भाव का अद्भुत मेल देखने को मिलता है आप की लेखनी में. जब आप की ऐसी रचनाएँ पढने को मिलती हैं तो आप से मुम्बई ना मिल पाने का अवसाद और भी गहरा हो जाता है. भाई बहुत...बहुत ...बहुत...खूब.
नीरज

 
At 8:37 PM, Blogger रजनी भार्गव said...

बहुत सुन्दर रचना है,विशेषकर ये पँक्तियाँ,

पता नहीं कल नींद नैन के कितनी देर रहे आँगन में
इसीलिये बस एक स्वप्न आँखों में और बुने जाता हूँ

 
At 3:25 PM, Blogger मीनाक्षी said...

बहुत सुन्दर काव्य ! उच्च भाषाशैली की उत्तम रचना पढ़कर प्रशंसा के शब्द ही नहीं मिलते....

 
At 10:46 PM, Blogger Dr.Bhawna said...

बहुत अच्छी रचना के लिये बहुत सारी बधाई...
आपको परिवार सहित नववर्ष की ढेरों मंगलकामनायें...भावना,प्रगीत, कनुप्रिया और एश्वर्या की तरफ से...

 

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