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Showing posts from October, 2007

कल वे सब धूमिल हो लेंगें

आज नयन के पाटल पर जो चित्र बने जाने अनजाने
कल तक इतिहासों के पन्नों में वे सब धूमिल हो लेंगे

आज सुवासित करती है जो कली फूल बन कर उपवन को
उसकी नियति पांखुरी बन कर निश्चित है कल को झर जाना
पथ की सिकता जितने पग के चिन्ह लगाये है सीने से
कल तक एक हवा के झोंके से छूकर उनको मिट जाना

और आज पग जिन राहों को मंज़िल का पथ बना रहे हैं
कल को ये पथ इन कदमों की संभव है मंज़िल हो लेंगे

आंख-मिचौली, गिल्ली डंडा, रंगीं कंचे, टूटी चूड़ी
वह गलियों का मानचित्र की रेखाओं में घुलते जाना
चढ़ते हुए उमर की छत पर फ़ांद वयस-संधि मुंड़ेर को
नई शपथ का नये साथ का सहसा इक पौधा उग आना

दॄष्टि कलम तब लिख देती है जिन पन्नों पर प्रेम कथायें
संभव है वे पन्ने फट कर कल इक टूटा दिल हो लेंगे

चौबारे की तुलसी के चौरे पर दीप जला संध्या का
कितनी दूर प्रकाशित पथ को यायावर के कर पाता है
कंदीलों को गगन दीप की केवल संज्ञा दे लेने से
अंधियारी पावस रजनी का तिमिर दूर कब हो पाता है

आज खुशी के रंगों में रँग जो पल हम सब बाँट रहे हैं
रखे याद की मंजूषा में कल ये पल बोझिल हो लेंगें

बस इतना तुम याद न आओ

शपथ तुम्हें है मुझसे लेलो मेरी खुशियाँ, मेरे जीवन
जी न सकूँ में बिना तुम्हारे, बस इतना तुम याद न आओ

खंजननयने, तुम्हें विदित है तुम आधार मेरे जीवन का
शतदलरुपिणी ज्ञात तुम्हें है, तुम हो कारण हर धड़कन का
मौन सुरों की सरगम वाली वीणा की ओ झंकॄत वाणी
तुम ही तो निमित्त हो मेरे शतजन्मों के अनुबन्धन का

शपथ तुम्हारी, वापिस ले लो अपने प्यार भरे आलिंगन
मैं निमग्न जिनमें हो जाऊँ, अब इतना तुम याद न आओ

गुलमोहर की अमलतास की छांहों में लगते थे डेरे
वे अतीत के क्षण रहते हैं अक्सर ही सुधियों को घेरे
उनकी सुरभि सदा महकाती है मन का सूना गलियारा
घोर निशा में दोपहरी में, ढले सांझ या उगें सवेरे

वे पल मैने सुमन बनाकर रखे किताबों के पन्नों में
उनको किन्तु नहीं पढ़ पाऊँ, अब इतना तुम याद न आओ

उंगली के पोरों पर दस दस बल में लिपटी हुई ओढ़नी
पगनख से हस्ताक्षर करती हुई धरा पर एक मोरनी
रह रह कर पुस्तक के पन्नों से उठती झुकती वे नजरें
हरी सुपारी वाली कसमें सहज उठानी, सहज तोड़नी

मेरी निधि से ले लो चाहे पीपल छाया, घनी दुपहरी
आँचल से मैं चंवर डुलाऊँ, बस इतना तुम याद न आओ

तुझ पर ही सब कुछ आधारित

पिघले हुए स्वाति-चन्दा से
टपक गि्रीं सीपी मे बूंदें
जो, उन सबने आज सुनयने
तेरे अधरों को चूमा है

अलकापुर की सुरसरिता में
सद्य:स्नाता एक अप्सरा
उसके ही लंबे केशों से
मौक्त मणि का अंश जो झरा
पारिजात ने पांखुर के
प्याले में उसको रखा सहेजा
और एक आभूषण में फिर
ॠतुशिल्पी ने जिसे है जड़ा

रति के हस्ताक्षर से सज्जित
है जो यही अलौकिक माला
उसकी ही बस इक थिरकन पर
मन सम्मोहित हो झूमा है

अभिव्यक्ति के क्षीर-सिन्धु में
गोते खाने की अभिलाषा
पर शब्दों से कॄपण, कोष को
रिक्त देख मन रहता प्यासा
अक्षर अक्षर जोड़ जोड़ कर
बुने हुए पल और निमिष में
अनुभूति के एक अर्थ को
समझ, जानने की जिज्ञासा

प्रणय निवेदन के भावों से
भरे हुए इक भावालय को
साथ लिये मन का यायावर
तेरे चहुं ओर घूमा है

सगर वंशजों की आराधित
उमाकान्त की केशवासिनी
की पायल की झंकारों से
जागी है जो मधुर रागिनी
वह जमना की सिकता में जो
घुले हुए वंशी के स्वर हैं
को लेकर आकांक्षित है
बन सके कंठ की अंकशायिनी

उसी एक आतुर आशा की
आंखों का सतरंगी सपना
बार बार कहता है आकर
तेरी आंखों को छूना है

अधरों की थिरकन से फिसले
हुए शब्द की जर्जर काया
द्रुत सरगम पर ख्याल बिलम्बित
जीवन के साजों ने गाया
किन्तु तार के सप्तक…

१५०वीं पोस्ट-- एक वह प्रस्तावना हो

मीत तुम मेरे सपन के इन्द्रधनुषी इक कथानक
के लिये जो पूर्णिमा ने है लिखी, प्रस्तावना हो


जानता हूँ जो दिवस के संग शुरू होगी कहानी
पाटलों पर जो लिखेगी, रश्मि बून्दों की जुबानी
पंछियों के कंठ के स्वर का उमड़ता शोर लेकर
गंध में भर कर सुनायेगी महकती रात रानी

और हर अध्याय में जो छाप अपनी छोड़ देगी
तुम उसी के केन्द्रबिन्दु की संवरती कामना हो

फूल के द्वारे मधुप ने आ जिसे है गुनगुनाया
धार की अँगड़ाइयों ने साज पर तट के बजाया
ज्योति पॄष्ठों पर लिखा है जल जिसे नित वर्त्तिका ने
नॄत्य करते पांव को जो घुंघरुओं ने है सुनाया

वह विलक्षण राग जो संगीत बनता है अलौकिक
तुम उसी इक राग की पलती निरंतर साधना हो

आहुति के मंत्र में जो घुल रही है होम करते
जो जगी अभिषेक करने, सप्त नद का नीर भरते
मधुमिलन की यामिनी में स्वप्न की कलियां खिला कर
जो निखरती है दुल्हन के ध्यान में बनते संवरते

शब्द की असमर्थता जिसको प्रकाशित कर न पाई
मीत तुम अव्यक्त वह पलती ह्रदय की भावना हो

हो गई जड़ ये कलम अब

लेखनी अब हो गई स्थिर
भाव की बदली न छाती मन-गगन पर आजकल घिर

आँख से बहती नहीं अब कोई अनुभूति पिघल कर
स्वर नहीं उमड़े गले से, होंठ पर आये फ़िसल कर
उंगलियों की थरथराहट को न मिलता कोई सांचा
रह गया संदेश कोशिश का लिखा, हर इक अवांचा

गूँजता केवल ठहाका, झनझनाते मौन का फ़िर

चैत-फ़ागुन,पौष-सावन, कुछ नहीं मन में जगाते
स्वप्न सारे थक गये हैं नैन-पट दस्तक लगाते
अर्थहीना हो गया हर पल विरह का व मिलन का
कुछ नहीं करता उजाला, रात का हो याकि दिन का

झील सोई को जगा पाता न कंकर कोई भी गिर

दोपहर व सांझ सूनी, याद कोई भी न बाकी
ले खड़ी रीते कलश को, आज सुधि की मौन साकी
दीप की इक टिमटिमाती वर्त्तिका बस पूछती है
हैं कहां वे शाख जिन पर बैठ कोयल कूकती है

रिक्तता का चित्र आता नैन के सन्मुख उभर फिर

जो हवा की चहलकदमी को नये नित नाम देती
जो समंदर की लहर हर एक बढ़ कर थाम लेती
जो क्षितिज से रंग ले रँगती दिवस को यामिनी को
जो जड़ा करती सितारे नभ, घटा में दामिनी को

वह कलम जड़ हो गई, आशीष चाहे- आयु हो चिर