आप

आपकी प्रीत में डूब कर मीत हम, भोर से सांझ तक गुनगुनाते रहे
नैन के पाटलों पर लगे चित्र हम रश्मि की तूलिका से सजाते रहे
आपके होंठ बन कर कलम जड़ गये, नाम जिस पल अधर पर कलासाधिके
वे निमिष स्वर्णमय हो गये दीप से, बन के दीपावली जगमगाते रहे

Comments

Udan Tashtari said…
बेहतरीन!!
Devi Nangrani said…
जाने कैसे सुन्हरे ये शब्दार्थ है
कान में गूँज बनकर बुलाते रहे.

दाद के साथ
देवी

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