१००वीं प्रस्तुति --अंतरे खो गये

जब भी चाहा है मैने लिखूँ गीत मैं
शिल्प मुखडे हुए, अंतरे खो गये

मन की गहराईयों से उठी भावना
पर अधर की सतह तक नहीं आ सकी
कुनमुनाती हुई मेरी सुधियाँ रहीं'
ताल पर सरगमों की नहीं गा सकी
नैन की प्यालियों में उफ़नते रहे
स्वप्न संवरे नहीं एक पल के लिये
आग थी तेल था और बाती भी थी
पर नहीं जल सके रास्ते में दिये

द्वार जब खटखटाया मेरा भोर ने
थक के सारे के सारे प्रहर सो गये

भोज पत्रों पे लिक्खी कहानी थी जो
आईं इतिहास से वे निकल सामने
मैथिली होके तत्पर प्रतीक्षित रही
ली न अग्नि-परीक्षा मगर राम ने
मुद्रिका ढूँढ पाई न शाकुन्तले

और दुष्यन्त जलता अकेला रहा
प्रश्न हर युग में दमयंतियों ने किये
किन्तु उत्तर में कुछ न नलों ने कहा

साक्ष्यदर्शी समझते जिन्हें हम रहे
वे सभी गुम अंधेरों में हैं हो गये

पंचतन्त्री कथाओं में उलझे रहे
किन्तु जाने नहीं आज तक नीतियाँ
बंद पलकें किये अनुसरण कर रहे
जो बना कर गये पूर्वज रीतियाँ
नींव रखते रहे हैं कई बार, पर
कोई निर्माण पूरा नहीं कर सके
चाहतों के चषक रिक्त थे सामने
किन्तु इक बूँद भी हम नहीं भर सके

सावनी मेघ आये तो थे घिर मगर
बरसे बिन ही हवा में विलय हो गये

चाँदनी की गली में सितारे उगे
कोई पहचान अपनी नहीं पा सके
सरगमों की तराई में खिलते हुए
राग नूतन कोई स्वर नहीं गा सके
धूप की कामनायें किये जा रहे
छोड पाये घटाओं का साया नहीं
हम प्रतीक्षा बहारों की करते रहे
जिनको हमने कभी था बुलाया नहीं

राह की शून्यता देखते, सोचते
इस डगर के पथिक सब, कहाँ खो गये.

Comments

Udan Tashtari said…
शब्द शिल्पी, गीत सम्राट माननीय राकेश खंडेलवाल जी को इस शतकीय पोस्ट के लिये बहुत बहुत हार्दिक बधाई और शुभकामनायें.

आगे भी ऐसे ही अनेकों शतक लगाते रहें और हम सभी इस गीत गंगा में अनवरत डुबकी लगाते रहें, यही अभिलाषा है.

पुनः बहुत बधाई. हमारी तालियों की आवाज दिल से सुनिये.
राकेश जी बहुत बहुत बधाई। आप तो आशुकवि हैं। आपके लिये एक हज़ार कवितायें लिख लेना भी कोई बड़ी बात नहीं। यूं ही सुंदर गीत लिखते रहें और हम पढ़ते रहें। बधाई एक बार फिर। 'गांव का व्यवहार क्या हो' भी सुनी। पहले कमेंट नहीं कर पाई। बहुत अच्छी प्रस्तुति लगी।
अभिनव said…
वाह राकेश भाईसाहब,
गीतों के इस शतक पर हमारी शुभकामनाएँ भी स्वीकारें।
"इस डगर के पथिक सब, कहाँ खो गये।" बहुत बढ़िया शतकीय गीत है।
अब इनकी एक और पुस्तक भी छपवा लीजिए।
Anonymous said…
रिपुदमन पचौरी said....

जब भी चाहा अनल का मुख मोड़ कर,
तुम हो सवार कल्पना की उड़ान भरते गये

इक शिल्प को मुखड़ों में ढ़ाल जो सके
और बात जो कहनी थी किन्तु वो रहे
प्रयास संभव कर सकते केवल है वही
स्वर स्वामिनी कृपा जिनपर करती रहे !
लेखनी तुम्हरी बीज वट के बोती रही
छंद तुमहारे कुंतुल छाँओंदार बड़ते गये

जब भी चाहा अनल का मुख मोड़ कर,
तुम हो सवार कल्पना की उड़ान भरते गये

ज्यों गंध, कोई मृगलोचनी अपनी
घोर आरण्य में ही रही हो ढ़ूँढ़ती
सो स्वर तेरे रखखे, होठ के कोर पर
है दुग्दुगी जिनकी रही है बोलती
पर ना शायद तुम उनको सुन सके
और हम रसपान उनका करते रहे

अबोध थे वे सत्य को ना जान सके,
जो अर्थ सभी संदर्भो में लेजा खोते गये.....
और तुम ...........
जब भी चाहा अनल का मुख मोड़ कर,
हो सवार कल्पना की उड़ान भरते गये

रिपुदमन पचौरी
Pratyaksha said…
बधाई ! बधाई !
ऐसे और कई शतक आपकी लेखनी से निकलते रहें ।
Beji said…
राकेश जी आपकी हर कविता सुन्दर और अर्थपूर्ण होती है । जीवन के तथ्यों से परिचित , संवेदनशीलता से भरपूर, शुद्ध और उपयुक्त शब्दों को मनचाहे भाव में ढाल सकना माँ सरस्वती की आप पर विशेष कृपा को दर्शाती है ।
आपकी सभी रचनायें पसंद हैं...खुद के आधे अधूरे ज्ञान की वजह से कभीकभार कवितायें का संपूर्ण अर्थ नहीं समझ पाती । पर आपकी हर रचना का इंतज़ार रहता है । हर कविता सदैव नई लगती है....और उन्हे फिर लौटकर पढ़ने की इच्छा रहती है ।

रिपुदमन जी ने हम सभी की भावना को बेहद सुंदरता से शब्दों में बाँधा है ।
Divine India said…
मेरी ओर से भी इस शतकीय गीत कलश के लिए बधाई…आपकी रचनाओं में कुछ अलग ही बोल होते है…जिसे पढ़कर कुछ सीखा जा सकता है।
manya said…
इस शतक के लिये मेरी बधाई स्वीकार करें.. बहुत अच्छा लगा आपकी रचना पढ्ना.. कुछ अलग ही भाव हैं.. हॄदय की वीणा पर बजते गीत से..
बहुत सुन्दर रचना है बाकी अभी बहुत कुछ पढने एंव समझने को बाकी है
मेरे ब्लाग http://dilkadarpan.blogspot.com पर पधार कर अपनी टिप्पणी से मेरी रचनाओं का मुल्याकंन करने की कृपा करें
विशेष रूप से मेरी एक कविता "केवल संज्ञान है" जो http://merekavimitra.blogspot.com पर प्रेषित है आप की टिप्पणी की प्रतीक्षा में है

मोहिन्दर
आपकी यों ही शुभकामनायें मिलें
लेखनी शब्द तब ही चितेरा करे
मेरी मावस सी एकाकियत में सदा
आपका नेह आकर सवेरा करे
मैने चिट्ठे पे रख कर कलश गीत का
दो बरस में भरी बून्द हैं एक सौ
आपका साथ अनुराग मेरे रहे
फूल ये गंध तब ही बिखेरा करे
Anonymous said…
डा. रमा द्विवेदी

राकेश जी,
अभी अभी आपका शतकीय गीत पढा बहुत बहुत अच्छा लगा.....मेरी ओर से आपको ढेर सारी हार्दिक बधाई स्वीकार हो और हमारी आकांक्षा है आप ऐसे कई शतक पूरे करें.....मां वीणा पाणि का वरदहस्त हमेशा आप पर बना रहे और आप ऐसे ही सुमधुर , नये बिंब एवं नये प्रतीकों और नये शिल्प के साथ रचनाएं रचते रहें .....इसी कामना के साथ.....आपका गीत "गांव का व्यव्हार क्या हो" भी सुना बहुत अच्छा लगा....हमारी शुभकामनाएं सदैव आपके साथ हैं...

डा. रमा द्विवेदी
Dr.Bhawna said…
सुन्दर रचना है राकेश जी। बहुत-बहुत बधाई। ये पंक्तियाँ विशेष रूप से अच्छी लगीं।

बहुतचाँदनी की गली में सितारे उगे
कोई पहचान अपनी नहीं पा सके
सरगमों की तराई में खिलते हुए
राग नूतन कोई स्वर नहीं गा सके
धूप की कामनायें किये जा रहे
छोड पाये घटाओं का साया नहीं
हम प्रतीक्षा बहारों की करते रहे
जिनको हमने कभी था बुलाया नहीं
रमाजी एवं भावनाजी

गीत कलश पर यह मेरी १००वीं प्रस्तुति है. गीतों की संख्या तो निरन्तर बढ़ती रही है. २००५ में जबसे चिट्ठा लिखना प्रारंभ किया, तबसे यह गिनती यहां शुरू हुई. आपकी शुभकामनाओं के लिये धन्यवाद
Neeraj tripathi said…
Adbhut.. Maja aa gaya .
Aapka Shatak dekh achha laga. Jaldi se Lara ka 400 waala record todiye....
Shar said…
Abhi yeh kavita padhi aap ki. Kuch dinao pahle Dushare ki din ek kavita likhi thi meine aur sochti thi ki kisi ne kyon kuch nahin kaha us pe. Jab aap jaise maharathi ke haat se koi bhavana pahle hi kundan ban gayi ho toh hamare kagaz ke phoolon ki kya bisaat hei. Phir bhi mujh jaise naushikhiyon ko jagane ke liye yahan dono ek saath likh rahi hoon, jis-se log acchi kavita aur buri kavita mein farak samjhein:)

Pahle Guruji Ki:
"जब भी चाहा है मैने लिखूँ गीत मैं
शिल्प मुखडे हुए, अंतरे खो गये
. . .
भोज पत्रों पे लिक्खी कहानी थी जो
आईं इतिहास से वे निकल सामने
मैथिली होके तत्पर प्रतीक्षित रही
ली न अग्नि-परीक्षा मगर राम ने
मुद्रिका ढूँढ पाई न शाकुन्तले
और दुष्यन्त जलता अकेला रहा
प्रश्न हर युग में दमयंतियों ने किये
किन्तु उत्तर में कुछ न नलों ने कहा

साक्ष्यदर्शी समझते जिन्हें हम रहे
वे सभी गुम अंधेरों में हैं हो गये"
**************
ab murkh shishya ki:
"तुम मनाओ दशहरे
हम आँख अपनी बंद करके,
उस दिवस के स्वप्न देखें
राम जब सीता ना परखें ।

विरहणी जब ना रहे
शाकुन्तला अंगूठी हारे,
हम कहेंगे प्रिय तुम्हें
न प्राण तुम तब तक हमारे ।"
Ek sona, ek dhool... period!

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