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Showing posts from June, 2006

प्रश्न हैं आधे अधूरे

ज़िन्दगी उलझी हुई है कुछ अधूरे प्रश्न लेकर
और उत्तर की कोई संभावना दिखती नहीं है

श्याम पट पर ज्यों हथेली की किसी ने छाप रख दी
कुछ त्रिभुज हैं, बिन्दु हैं कुछ और कुछ रेखायें धूमिल
जोड़ बाकी औ; गुणा के चिन्ह सारे खो गये हैं
हल समस्या कर सके उस पात्र की उपलब्धि मुश्किल
और संशोधन हुआ है एक भी त्रुटि का असंभव
कुछ मिटा कर फिर लिखें, उस भांति की तख्ती नहीं है

जानते हैं प्रश्न हैं कुछ, प्रश्न क्या पर कौन बूझे
प्रश्न भी जब प्रश्न पूछे तो न उत्तर कोई सूझे
अब चलन बदले, न उत्तर-माल सौंपी जा रही है
जो लिये सन्दर्भ सुलझाते रहे, थे और दूजे
वॄत्त के गोलार्ध में भटकी नजर दिन रात प्रति पल
जो सही उस एक बिन्दु पर मगर रुकती नहीं है

प्रश्न कुछ उगते रहे हैं अर्घ्य के जल से सवेरे
और कुछ अँगड़ाई लेते देख कर निशि के अँधेरे
कुछ जगाती, खनखनाहट चूड़ियों की पायलों की
और कुछ सहसा बिना कारण हवाओं ने चितेरे
डूब कर असमंजसों में रह गईं हैं राह सारी
और घड़ियों की गति, पल भी जरा थमती नहीं है.

आज भी

खुश्कियां मरूथलों की जमीं होंठ पर
शुष्क होठों पे उगती रही प्यास भी
आपके होंठ के स्पर्श की बदलियां
पर उमड़ के नहीं आ सकीं आज भी

नैन पगडंडियों पर बिछे रह गये
मानचित्रों में उल्लेख जिनका न था
इसलियी आने वाला इधर की डगर
राह भटका हुआ एक तिनका न था
चूमने पग कहारों के, मखमल बनी
धूल, नित धूप में नहा संवरती रही
गंध बन पुष्प की बाँह थामे हवा
कुछ झकोरों में रह रह उमड़ती रही

सरगमें रागिनी की कलाई पकड़
गुनगुनाने को आतुर अटकती रहीं
उंगलियों की प्रतीक्षा मे रोता हुआ
मौन होकर गया बैठ अब साज भी

रोलियां, दीप, चन्दन, अगरबत्तियाँ
ले सजा थाल आव्हान करते रहे
आपके नाम को मंत्र हम मान कर
भोर से सांझ उच्चार करते रहे
दिन उगा एक ही रूप की धूप से
कुन्तलों से सरक आई रजनी उतर
केन्द्र मेरी मगर साधना के बने
एक पल के लिये भी न आये इधर

घिर रही धुंध में ढूँढ़ती ज्योत्सना
एक सिमटे हुए नभ में बीनाईयां
स्वप्न कोटर में दुबके हुए रह गये
ले न पाये कहीं एक परवाज़ भी

हाथ में शेष, जल भी न संकल्प का
धार नदिया की पीछे कहीं रूक गई
तट पे आकर खड़ी जो प्रतीक्षा हुई
जो हुआ, होना था मान कर झुक गई,
जो भी है सामने वह प्लावित हुआ
बात ये और है धार इक न बही
जानते हैं अधूरी रहेगी …

पहचान पुरानी

जाने क्यों लगता है तुमसे है मेरी पहचान पुरानी
यद्यपि हम तुम मिले नहीं हैं और न देखी कोई निशानी

पहली बार सुना था मैने नाम तुम्हारा तो जाने क्यों
लगा बजी है जलतरंग सी जैसे कोई उद्यानों में
दुल्हन के अधरों पर पहला पहला कोई शब्द खिला हो
या सरोद की अँगड़ाई हो घुली पपीहे की तानों में

टेरी हो, कालिन्दी के तट पर बाँसुरिया हो दीवानी
जाने क्यों लगता है तुमसे है मेरी पहचान पुरानी

चित्र वीथिका की दीवारों पर जितने भी चित्र लगे हैं
उनमें सबमें अंकित लगता बनी प्रेरणा छवि तुम्हारी
भित्ति चित्र हों मूर्त्ति शिल्प हो, भले अजन्ता हो, मीनाक्षी
सबमें उभरी हुई कलाकॄति करती जयजयकार तुम्हारी

चित्र तुम्हारे बना तूलिका, होने लगती है अभिमानी
जाने क्यों लगता है तुमसे है मेरी पहचान पुरानी

व्यूह खामोशियों के

व्यूह खामोशियां हैं बनाये रहीं
और मन उन से नजरें चुराता रहा

अक्षरों में था मतभेद जुड़ न सके
शब्द पा न सके वाक्य की वीथिका
कुछ अलंकार षड़यंत्र रचते रहे
कुछ ढिंढ़ोरा बजाते रहे रीति का
मानचित्रों की रेखायें धुंधली हुईं
कोई पा न सका व्याकरण की गली
भावनायें भटकती रहीं रात दिन
रह गई अधखिली भाव की हर कली

जेठ होठों पे पपड़ी बना, बैठ कर
नैन के सावनों को चिढ़ाता रहा

स्वप्न थे रात के राह भटके हुए
कुछ मुसाफ़िर जो आये नहीं लौट कर
ड्यौढ़ियों पर नयन की चढ़े ही नहीं
जो गये एक पल के लिये रूठ कर
रात की स्याह चादर बिछाये हुए
नींद अँगनाई बैठी प्रतीक्षित रही
आया लेकिन नहीं एक दरवेश वो
प्रीत की एक जिसने कहानी कही

भोर का एक तारा मगर द्वार पर
हो खड़ा, व्यंग से मुस्कुराता रहा

दायरे परिचयों के हुए संकुचित
बिम्ब अपने भी अब अजनबी हो गये
उंगलियां थाम कर थे चले दो कदम
आज पथ के निदेशक हमें हो गये
स्वर निकल कर चला साज के तार से
देहरी पार फिर भी नहीं कर सका
राग याचक बने हाथ फैलाये थे
एक धुन, गूँज कोई नहीं भर सका

मौन फौलाद की एक दीवार का
क्षेत्रफ़ल हर घड़ी है बढ़ाता रहा

वादियों में भ्रमण के लिये थी गई
लौटी वापिस नहीं,ध्वनि वहीं खो गई
और आवाज़ को खोजते खोजते
एक निस्…

व्यर्थ में

व्यर्थ में आँसुओं को न अपने बहा
आँसुओं को सुमन कर अधर पर खिला

पीर अपनी प्रकाशित करे भी अगर
कोई पाठक नहीं पा सकेगा यहां
अजनबी दौर है, अजनबी लोग हैं
बोलता है नहीं कोई तेरी जुबां
भावनाओं की बारीकियाँ जान ले
इस सभागार में कोई ऐसा नहीं
कोशिशें करते थक जायेगा नासमझ
पत्थरों पर भला दूब जमती कहीं

तू बना कर हॄदय को शिखा दीप की
अपनी तारीकियों में उजाले जगा

सीप में मोतियों से, उगा कर कमल
तू नयन में बिठा एक कमलासनी
जब भी छलके कलश, तो हो अभिषेक को
व्यर्थ ही न बहा अपनी मंदाकिनी
सींच विश्वास की पौध को हर घड़ी
आस्था की उगा ले नई कोंपलें
एक संकल्प की छाँह रख शीश पर
रेत के तू घरों पर न कर अटकलें

छाई निस्तब्धता की थकन तोड़कर
प्रीत की पेंजनी के सुरों को जगा

ज़िन्दगी के अधूरे पड़े पॄष्ठ पर
लिख नये अर्थ लेकर कहानी नई
दर्द की थेगली पर बना बूटियाँ
चाह लिख जिसमें मीरा दिवानी हुई
खोल नूतन क्षितिज,घोष कर शंख का
अपनी सोई हुई मीत, क्षमता जगा
नभ के विस्तार को बाँह में थाम ले
देख रह जाये तुझको, ज़माना ठगा

राह खुद मंज़िलों में बदल जायेगी
हो कदम जो तेरा निश्चयों से भरा

आप- कुछ और दॄष्टि

आपके कुन्तलों में अमावस घुली और चेहरे पे छिटकी हुई पूर्णिमा
सूर्य सिमटा हुआ एक मुट्ठी में है और कंगन बँधा दूज का चन्द्रमा
आपकी चाल का अनुसरण कर रहीं, गंगा, गोदावरी, नर्मदा ताप्ती
आपकी दॄष्टि के इंगितों से बँधे, चर-अचर,सिन्धु, पर्वत, जमीं आसमाँ

..

चाँदनी पेड़ की फुनगियों से उतर, आ गई है दबे पाँव अँगनाई में
सैकड़ों चित्र बनने सँवरने लगे, आपकी देह की एक परछाई में
आपकी एक अँगड़ाई को देखकर अनगिनत फ़लसफ़े करवटें ले रहे
याद आने लगीं प्रेम गाथायें वे, भूमिका जिनकी लिखते थे तरुणाई में



रश्मियों से फिसलते हुए चांद की कुछ सितारे बिछे आपकी राह में
पांखुरी से उठी खिलखिलाती हुई, गंध कंगन बनी आपकी बांह में
झील में नॄत्य करती हुई इक लहर, आपकी आके अंगड़ाई में घुल गई
खनखनाती हुई वादियों की हवा, आज पायल बनी आपकी चाह में


आपके कंठ से स्वर लिया बज उठी, बांसुरी एक वॄन्दावनी रास की
आपके कुन्तलों से उमड़ छा गई नभ में आकर बदरिया मधुर आस की
आपने होंठ खोले तो बरसी सुधा, तॄप्ति के सिन्धु आकर तॄषा से मिले
आपकी दॄष्टि का स्पर्श पाकर जगे मन में सोये हुए स्वप्न विश्वास के