Friday, May 26, 2006

गुलमोहर

शची के कान का झूमर छिटक कर आ गिरा भू पर
या नख है उर्वशी के पांव का जो फूल बन आया
पड़ी है छाप कोई ये हिना रंगी हथेली की
किसी की कल्पना का चित्र कोई है उभर आया
चमक है कान की लौ की, लजाती एक दुल्हन की
उतर कर आ गई है क्या, कहीं संध्या प्रतीची से
किसी पीताम्बरी के पाट का फुँदना सजा कोई
कहीं ये आहुति निकली हुई है यज्ञ-अग्नि से
किसी आरक्त लज्जा का सँवरता शिल्प ? संभव है
जवाकुसुमी पगों की जम गई उड़ती हुई रज है
या कुंकुम है उषा के हाथ से छिटका बिखर आया
या गुलमोहर, लिये ॠतुगंध, शाखों पर चला आया

Wednesday, May 24, 2006

गज़ल बन गई

आपकी दॄष्टि का जो परस मिल गया, फूल की एक पांखुर कमल बन गई
आपका हाथ छूकर मेरे हाथ में भाग्य की एक रेखा अटल बन गई
शब्द की यह लड़ी जो रखी सामने, हो विदित आपको यह कलासाधिके
आपके पग बँधी थी तो पायल रही, मेरे होठों पे आई गज़ल बन गई

Saturday, May 20, 2006

आप उपवन में आये

आपके पग उठे जब इधर की तरफ़
यों लगा मुस्कुराने लगी हर दिशा
छंद की पालकी में विचरने लगे
भाव मन की उभरती हुई आस के

डाल से फूल गिरने लगे राह में
आपके पांव को चूमने के लिये
शाखें आतुर लचकती हुई हो रहीं
आपके साथ में झूलने के लिये
होके पंजों के बल पर उचकते हुए
लग पड़ी दूब पग आपके देखने
झोंके पुरबाई के थाम कर उंगलिया
चल पड़े साथ में घूमने के लिये

आप उपवन में आये तो कलियां खिली
रंग पत्तों पे आने नये लग पड़े
इक नई तान में गुनगुनाने लगे
वॄंद मधुपों के,नव गीत उल्लास के

सावनी चादरें ओढ़ सोया, जगा
आपको देखने आ गया फिर मदन
बादलों के कदम लड़खड़ाने लगे
पी सुधा जो कि छलकी है खंजन नयन
पत्तियों के झरोखों से छनती हुई
धूप रँगने लगी अल्पना पंथ में
मलती पलकें लगीं जागने कोंपलें
आँख में अपने ले मोरपंखी सपन

चलते चलते ठिठक कर हवायें रूकीं
खिल गये ताल मे सारे शतदल कमल
तट पे लहरों के हस्ताक्षरों ने लिखे
गुनगुनाते हुए गीत मधुमास के

चंपई रंग में डूब कर मोतिया
खुद ब खुद एक गजरे में गुँथने लगा
एक गुंचा गुलाबों का हँसता हुआ
आपको देख कर रह गया है ठगा
जूही पूछे चमेली से ये तो कहो
देह कचनार को क्या मिली आज है
गुलमोहर आपको देख कर प्रीत के
फिर नये स्वप्न नयनों में रँगने लगा

भूल कर अपने पारंपरिक वेष को
आपके रंग में सब रँगे रह गये
जिन पे दूजा न चढ़ पाया कोई कभी
सारे परिधान थे जो भी सन्यास के

Thursday, May 11, 2006

मातॄ दिवस २००६

कोष के शब्द सारे विफ़ल हो गये भावनाओं को अभिव्यक्तियाँ दे सकें
सांस तुम से मिली, शब्द हर कंठ का, बस तुम्हारी कॄपा से मिला है हमें
ज़िन्दगी की प्रणेता, दिशादायिनी, कल्पना, साधना, अर्चना सब तुम्हीं
कर सकेंगे तुम्हारी स्तुति हम कभी, इतनी क्षमता न अब तक मिली है हमें

Thursday, May 04, 2006

हमारी होगी

गम से अपनी यारी होगी
फिर कैसी दुश्वारी होगी

सपने घात लगा बैठे हैं
आँख कभी निंदियारी होगी

दिल को ज़ख्म दिये आँखों ने ?
बरछी, तीर कटारी होगी

भोर उगे या सांझ ढले बस
चलने की तैयारी होगी

खुल कर दाद जहां दी तुमने
वो इक गज़ल हमारी होगी

बहुत दिनों से लिखा नहीं कुछ
शायद कुछ लाचारी होगी

कहो गज़ल या कहो गीतिका
रचना एक दुधारी होगी

लिख पाया नहीं गीत कोई

लिख पाया नहीं गीत कोई, थक गई कलम कोशिश करते
हो गये अजनबी शब्द सभी, फिर कहते भी तो क्या कहते

हड़ताल भावना कर बैठी, मन की है अँगनाई सूनी
सपनों ने ले सन्यास लिया, बैठे हैं कहीं रमा धूनी
हो क्रुद्ध व्याकरण विमुख हुई, छंदों ने संग मेरा छोड़ा
अनुबन्ध अलंकारों ने हर, इक पल में झटके से तोड़ा

अधरों के बोल थरथरा कर हो गये मौन डरते डरते
लिख पाया नहीं गीत कोई, थक गई कलम कोशिश करते

पत्थर पर खिंची लकीरों सी आदत थी हमको लिखने की
भावुकता के बाज़ारों में थी बिना मोल के बिकने की
सम्बन्धों को थे आँजुरि में संकल्पों जैसे भरे रहे
हर कोई होता गया दूर, हम एक मोड़ पर खड़े रहे

मरुथल का पनघट सूना था, टूटी गागर थी क्या भरते
हो गये अजनबी शब्द सभी, हम कहते भी तो क्या कहते

गलियों में उड़ती धूल रही उतरी न पालकी यादों की
पांखुर पांखुर हो बिखर गई जो पुष्प माल थी यादों की
बुझ गये दीप सब दोनों के लहरों पर सिरा नहीं पाये
सावन के नभ सी आशा थी, इक पल भी मेघ नहीं छाये

मन की माला के बिखरेपन पर नाम भला किसका जपते
लिख पाया नहीं गीत कोई, थक गई कलम कोशिश करते