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Showing posts from May, 2006

गुलमोहर

शची के कान का झूमर छिटक कर आ गिरा भू पर
या नख है उर्वशी के पांव का जो फूल बन आया
पड़ी है छाप कोई ये हिना रंगी हथेली की
किसी की कल्पना का चित्र कोई है उभर आया
चमक है कान की लौ की, लजाती एक दुल्हन की
उतर कर आ गई है क्या, कहीं संध्या प्रतीची से
किसी पीताम्बरी के पाट का फुँदना सजा कोई
कहीं ये आहुति निकली हुई है यज्ञ-अग्नि से
किसी आरक्त लज्जा का सँवरता शिल्प ? संभव है
जवाकुसुमी पगों की जम गई उड़ती हुई रज है
या कुंकुम है उषा के हाथ से छिटका बिखर आया
या गुलमोहर, लिये ॠतुगंध, शाखों पर चला आया

गज़ल बन गई

आपकी दॄष्टि का जो परस मिल गया, फूल की एक पांखुर कमल बन गई
आपका हाथ छूकर मेरे हाथ में भाग्य की एक रेखा अटल बन गई
शब्द की यह लड़ी जो रखी सामने, हो विदित आपको यह कलासाधिके
आपके पग बँधी थी तो पायल रही, मेरे होठों पे आई गज़ल बन गई

आप उपवन में आये

आपके पग उठे जब इधर की तरफ़
यों लगा मुस्कुराने लगी हर दिशा
छंद की पालकी में विचरने लगे
भाव मन की उभरती हुई आस के

डाल से फूल गिरने लगे राह में
आपके पांव को चूमने के लिये
शाखें आतुर लचकती हुई हो रहीं
आपके साथ में झूलने के लिये
होके पंजों के बल पर उचकते हुए
लग पड़ी दूब पग आपके देखने
झोंके पुरबाई के थाम कर उंगलिया
चल पड़े साथ में घूमने के लिये

आप उपवन में आये तो कलियां खिली
रंग पत्तों पे आने नये लग पड़े
इक नई तान में गुनगुनाने लगे
वॄंद मधुपों के,नव गीत उल्लास के

सावनी चादरें ओढ़ सोया, जगा
आपको देखने आ गया फिर मदन
बादलों के कदम लड़खड़ाने लगे
पी सुधा जो कि छलकी है खंजन नयन
पत्तियों के झरोखों से छनती हुई
धूप रँगने लगी अल्पना पंथ में
मलती पलकें लगीं जागने कोंपलें
आँख में अपने ले मोरपंखी सपन

चलते चलते ठिठक कर हवायें रूकीं
खिल गये ताल मे सारे शतदल कमल
तट पे लहरों के हस्ताक्षरों ने लिखे
गुनगुनाते हुए गीत मधुमास के

चंपई रंग में डूब कर मोतिया
खुद ब खुद एक गजरे में गुँथने लगा
एक गुंचा गुलाबों का हँसता हुआ
आपको देख कर रह गया है ठगा
जूही पूछे चमेली से ये तो कहो
देह कचनार को क्या मिली आज है
गुलमोहर आपको देख कर प्रीत के
फिर नये स्वप्न नयनों में…

मातॄ दिवस २००६

कोष के शब्द सारे विफ़ल हो गये भावनाओं को अभिव्यक्तियाँ दे सकें
सांस तुम से मिली, शब्द हर कंठ का, बस तुम्हारी कॄपा से मिला है हमें
ज़िन्दगी की प्रणेता, दिशादायिनी, कल्पना, साधना, अर्चना सब तुम्हीं
कर सकेंगे तुम्हारी स्तुति हम कभी, इतनी क्षमता न अब तक मिली है हमें

हमारी होगी

गम से अपनी यारी होगी
फिर कैसी दुश्वारी होगी

सपने घात लगा बैठे हैं
आँख कभी निंदियारी होगी

दिल को ज़ख्म दिये आँखों ने ?
बरछी, तीर कटारी होगी

भोर उगे या सांझ ढले बस
चलने की तैयारी होगी

खुल कर दाद जहां दी तुमने
वो इक गज़ल हमारी होगी

बहुत दिनों से लिखा नहीं कुछ
शायद कुछ लाचारी होगी

कहो गज़ल या कहो गीतिका
रचना एक दुधारी होगी

लिख पाया नहीं गीत कोई

लिख पाया नहीं गीत कोई, थक गई कलम कोशिश करते
हो गये अजनबी शब्द सभी, फिर कहते भी तो क्या कहते

हड़ताल भावना कर बैठी, मन की है अँगनाई सूनी
सपनों ने ले सन्यास लिया, बैठे हैं कहीं रमा धूनी
हो क्रुद्ध व्याकरण विमुख हुई, छंदों ने संग मेरा छोड़ा
अनुबन्ध अलंकारों ने हर, इक पल में झटके से तोड़ा

अधरों के बोल थरथरा कर हो गये मौन डरते डरते
लिख पाया नहीं गीत कोई, थक गई कलम कोशिश करते

पत्थर पर खिंची लकीरों सी आदत थी हमको लिखने की
भावुकता के बाज़ारों में थी बिना मोल के बिकने की
सम्बन्धों को थे आँजुरि में संकल्पों जैसे भरे रहे
हर कोई होता गया दूर, हम एक मोड़ पर खड़े रहे

मरुथल का पनघट सूना था, टूटी गागर थी क्या भरते
हो गये अजनबी शब्द सभी, हम कहते भी तो क्या कहते

गलियों में उड़ती धूल रही उतरी न पालकी यादों की
पांखुर पांखुर हो बिखर गई जो पुष्प माल थी यादों की
बुझ गये दीप सब दोनों के लहरों पर सिरा नहीं पाये
सावन के नभ सी आशा थी, इक पल भी मेघ नहीं छाये

मन की माला के बिखरेपन पर नाम भला किसका जपते
लिख पाया नहीं गीत कोई, थक गई कलम कोशिश करते