गीत सावन के
तुम्ही बतलाओ गाऊं किस तरह मैं गीत सावन के
हवा की पालकी पर बैठ आया पतझरी मौसम
विरह के मरुथलों में आस की बदली गई हो गुम
पलक पर से फिसलते रह गये बस पांव सपनों के
गई खो क्रन्दनों के शोर में आल्हाद की सरगम
अधर पर आये भी तो शब्द आये सिर्फ़ अनबन के
लपेटे हैं खड़ीं अमराईयां बस धुन्ध की आँचल
भटकती ले पता इक हाथ में पगड्म्डियां पागल
न ओढ़े सूर्यबदनी रश्मियां घूँघट घटाओं का
न फ़ैला है गगन के मुख अभी तक रात का काजल
अभी जागे नहीं हैं नींद से दो बोल कंगन के
जवा के रंग से बिछुड़ा अलक्तक है पड़ा गुनसुन
न बेला है न जूही है, न दिखता है कोई विद्रुम
हिनाई उंगलियां छूती नहीं हैं आँख का काजल
न बोले चूड़ियां बिछवा न करता बात भी कुंकुम
सुनाई दे रहे स्वर बस हवा की एक सन सन के
दिशाओं के झरोखों में न लहरे हैं अभी कुन्तल
जलद की वीथियों में दामिनी दिखती नहीं चंचल
न पैंगें ले रहीं शाखें कहीं पर नीम पीपल की
न छलकी है गगन के पंथ में यायावरी छागल
न होठों पर हैं मल्हारें, न हैं पगशोर ही घन के
न धागे ही बँधे अब तक किसी सूनी कलाई में
सजे टीके न माथे पर श्वसुर घर से विदाई में
खनकती दूरियां केवल, न खनके चूड़ियां कँगना
न बूँदों के दिखे मोती घटा की मुँह दिखाई में
अपरिचित स्पर्श तन से हैं अभी बरखा के चुम्बन के
आँसुओं के शिविर
आस थी राह के मोड़ पर जा खड़ी फूल गुलदान में कुछ सजाती रही ज़िन्दगी दूसरी राह पर चल रही दूर से ही अँगूठा दिखाती रही प्रीत के पंथ आँसू बना कर शिविर अपने साम्राज्य की घोषणा कर रहे चाहतों के सरोवर, मरूमेह की छटपटाती हुई साध से भर रहे नैन की डालियों पर सपन की कली मुस्कुराने से पहले ही झड़ती रही अलगनी पर प्रतीक्षा की लटकी हुई पीर भुजपाश की और बढ़ती रही सांझ के धुंधले आलाव में रात की सुरमई चाँदनी खिलखिलाती रही मुट्ठियों के झरोखों से रिसता रहा कुछ भी संचित हो रह न सका कोष में वक्त का हर निमिष दूर से बह गया यों लगा हो कि जैसे भरा रोष में पोर उंगली के छू न सके शून्य भी हाथ फैले, न था कोई भी सामने एक संतोष बैठा लगा पालथी ये ही किस्मत में शायद लिखा राम ने जब भी पुरबाई भूले से आई इधर आँधियों की तरह सनसनाती रही टाँग ईजिल पे वयसन्धियों के चरण कूचियां साँस की रंग भरती रहीं पी गये कैनवस रंग की धार को आकॄतियाँ कुहासी उभरती रहीं अपना अस्तित्व पहचानने के लिये एक दर्पण को हम ढूँढ़ते रह गये धागे टूटे हुए शेष परिचय के सब अजनबी बाढ़ के साथ में बह गये दीप की वर्तिका आँजुरि में जली हाथ में नव लकीरें बनाती रही पीढ़ियों की जो अर्जित धरोहर मिली खर्च करते रहे सोचे समझे बिना अल्पना सज सके कोई वीरान में हम लुटाते रहे हाथ की भी हिना मेघ चिकुरों में ढलने लगी चाँदनी किन्तु गत से न संबंध तोड़ा कभी हम जहां हैं, वहां हमको होना न था बस इसी कशमकश में रहे आज भी जेठ की धूप में बर्फ़ सी गल रहीं धड़कनें अर्थ अपना गंवाती रही
कैद सरगम
कैद सरगम, दर्द की शहनाईयों में रो रही है
आँसुओं के बीज, आँखों में निरन्तर बो रही है
स्वर भटकता कंठ के जा द्वार को है खटखटाता
पर निरुत्तर शून्य से कर सामना है लौट आता
शाख पर संचार की, अब फूल खिल पाते नहीं हैं
शब्द के, फिर से यहां पर स्याह पतझर जीत जाता
हो रही अवलोड़ना उठती तरंगों में निशा दिन
किन्तु ऐसा लग रहा है ध्येय अपना खो रही है
ठोकरों में राह की हैं भाव की अनगढ़ शिलायें
उक्तिया मिल सूक्तियों से कर रही हैं मंत्रणायें
बेरूखी से शिल्प की ऊबी हुई हैं मन मसोसे
हाथ पर रख हाथ बैठीं लक्षणायें व्यंजनायें
दूर अपने उद्गमों से काव्य-कालिन्दी, सरोवर
के तटों पर बैठ रह रह हाथ अपने धो रही है
व्याकरण के क्रुद्ध तेवर रोकते पथ भावना का
काटते हैं पर उड़ी हर कल्पना का कामना का
अधिनियम के कटघरे में बन्दिनी, अपराधिनी सी
जो खड़ी है, जल न पाता दीप कोई साधना का
हो रहे आलाप वैसे, हर तरफ़ मल्हार के ही
किन्तु बारिश अग्नि की ही, अब गगन से हो रही है.