Friday, December 08, 2006

तुमने मुझसे कहा

तुमने मुझसे कहा, चांद के रंग, गंध में डुबो डुबो कर
गये निखारे कुछ सपनों को, मेरे नयनों में भेजोगे
और प्रीतमय आशाओं की कूची से जो गये चितेरे
उन चित्रों को साथ बैठकर, एक नजर से तुम देखोगे

नयनों के वातायन के पट, मैने तब से खोल रखे हैं
चन्द्र किरण को अपने घर के पथ निर्देशन बोल रखे हैं
सेज प्रतीक्षित है, स्वागत-पथ पर फैलाये अपनी बाहें
आतिथेय को प्रक्षालन जल में, गुलाब भी घोल रखे हैं

रंग भरे धागों की डोरी में तारों से किये अलंकॄत
रक्त-पुष्प की जयमाला को थाली में रख कर भेजोगे

मन के उपवन ने मधुबन की बासंती चूनरिया ओढ़ी
आकुलता से व्याकुल होकर, पथ पर बैठी चाह निगोड़ी
आतुरता से बिंध अभिलाषा, रह रह उठे और फिर बैठे
उन्मादी सुधियों ने अपनी सुध-बुध की सीमायें तोड़ीं

देहरी पर रांगोली रंगने को तुम इन्द्रधनुष के संग में
अपने हाथों की मेंहदी में कुंकुम को रंग कर भेजोगे

चित्र लेख के श्रंगारों से सजी हुई घर की दीवारें
आकॄतियां आकंठ प्रीत में डूब, चित्र के रंग निखारें
आश्वासन को विश्वासों का आलंबन कर मुदित ह्रदय से
टँगी हुईं हैं दरवाजे पर, मन की कुछ चंचल मनुहारें

दॄष्टि-चुम्बनातुर चित्रों की जननी कोमल एक भावना
है निश्चिन्त आन तुम उसको अपनी बाहों में भर लोगे

2 comments:

ratna said...

सुन्दर चित्र।

Shar said...

हे भगवान् !