नींद के साथ शतरंज

यूँ तो कुछ भी न था जिसके भ्रम में फ़ँसी
कामना रात दिन छटपटाती रही
और पीपल की डाली पे बैठी हुई
एक बुलबुल पिया को बुलाती रही

गूँजती राह में पैंजनी की खनक
याकि गागर थकी एक सोई हुई
हों सहेली सी बतिया रही चूड़ियां
या कि तन्हा हो नथ एक खोई हुई
नैन के आंगनों में सपन बैठ कर
नींद के साथ शतरंज हों खेलते
और चुप इक किनारे खड़ी हो निशा
बीते दिवसों का भारी वज़न झेलते

सबकी आंखों में जलते हुए प्रश्न के
ज़िन्दगी मौन उत्तर सुनाती रही

सॄष्टि के थी संदेसे लिखे जा रही
इस धरा पर हलों की नुकीली कलम
एक ही है इबारत, कि दोहरा रहे
हम सभी जिसको अब तक जनम दर जनम
भोर बोझिल पलक से झगड़ती हुई
सांझ की जंग बढ़ती हुई नींद से
आस फूलों के रंगों में डूबी हुई
वक्त करता हुआ टुकड़े उम्मीद के

अपनी धुन में मगन एक हो, आस्था
रोज शिवलिंग पर जल चढ़ाती रही

जानते थे हथेली की रेखाओं में
कोई बाकी नहीं बच सकी भाग्य की
फ़िर भी अपने ही भ्रम में उलझ चाहना
आस करती रही कोई सम्भाव्य की
बढ़ चुके थे कदम, न निशां शेष थे
पर उठी ही नहीं है धरा से नजर
स्वप्न की डोर को थाम कर चल रही
अपने परिवेश से कट हुई बेखबर

था सुना द्वादशी पर बदलता सभी
फिर यही बात रह रह लुभाती रही

Comments

Udan Tashtari said…
"जानते थे हथेली की रेखाओं में
कोई बाकी नहीं बच सकी भाग्य की
फ़िर भी अपने ही भ्रम में उलझ चाहना
आस करती रही कोई सम्भाव्य की"

बहुत सुंदर भाव आयें हैं पूरी रचना में.
Dr.Bhawna said…
Rakesh ji
sundar motiyo se saji mala ha aapki ye rachna.
Bahut sundar likha ha aapne.bdhai

Dr.Bhawna

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