आप- कुछ और दॄष्टि

आपके कुन्तलों में अमावस घुली और चेहरे पे छिटकी हुई पूर्णिमा
सूर्य सिमटा हुआ एक मुट्ठी में है और कंगन बँधा दूज का चन्द्रमा
आपकी चाल का अनुसरण कर रहीं, गंगा, गोदावरी, नर्मदा ताप्ती
आपकी दॄष्टि के इंगितों से बँधे, चर-अचर,सिन्धु, पर्वत, जमीं आसमाँ

..

चाँदनी पेड़ की फुनगियों से उतर, आ गई है दबे पाँव अँगनाई में
सैकड़ों चित्र बनने सँवरने लगे, आपकी देह की एक परछाई में
आपकी एक अँगड़ाई को देखकर अनगिनत फ़लसफ़े करवटें ले रहे
याद आने लगीं प्रेम गाथायें वे, भूमिका जिनकी लिखते थे तरुणाई में




रश्मियों से फिसलते हुए चांद की कुछ सितारे बिछे आपकी राह में
पांखुरी से उठी खिलखिलाती हुई, गंध कंगन बनी आपकी बांह में
झील में नॄत्य करती हुई इक लहर, आपकी आके अंगड़ाई में घुल गई
खनखनाती हुई वादियों की हवा, आज पायल बनी आपकी चाह में


आपके कंठ से स्वर लिया बज उठी, बांसुरी एक वॄन्दावनी रास की
आपके कुन्तलों से उमड़ छा गई नभ में आकर बदरिया मधुर आस की
आपने होंठ खोले तो बरसी सुधा, तॄप्ति के सिन्धु आकर तॄषा से मिले
आपकी दॄष्टि का स्पर्श पाकर जगे मन में सोये हुए स्वप्न विश्वास के

Comments

Udan Tashtari said…
वाह राकेश भाई,
इतनी दूर बैठ कर भी आपकी कविता पढने के बाद नही लग रहा कि दूर आ गये हैं, वही ताजगी, वही मजा.
बहुत अच्छा लगा पढकर.
समीर लाल
धन्यवाद समीर
आपके सद्भाव लेखन को नई दिशा की ओर अग्रसर होते रहने की प्रेरणा देते हैं
Shar said…
जानते हैं गुरुजी, यह 'आप' शीर्षक देख के सोचा मैंने, ये फ़िर से सौन्दर्य का आराधन! फ़िर सोचा जो पढ़ने वाला सुन्दर ना हो वह कैसे जुड़ेगा इन मुक्तकों से ? जानते हैं फ़िर देखा की बाह्य रूप की तो बात ही नहीं है इनमें :) बहुत ही सुन्दर! ये सब के लिए हैं, उन सब के लिए जो भीतरी सुन्दरता रखते हैं :) बहुत खुशी हुई ये समझते ही और लगा कि आपको बताऊँ कि थोड़ी अक्ल आ गयी है आपकी शिष्या में भी :) Dec09

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