अन्तराल-विराम

लेखनी ओढ़ निस्तब्धता सो गई, शब्द पर एक ठहराव सा आ गया
हो गया है अपरिचित निमिष हर कोई, गीत बन जो कभी होठ पर छा गया
छंद से , रागिनी, ताल से हो विलग, भाव अभिव्यक्तियों बिन अधूरा रहा
नज़्म के मुक्तकों के गज़ल के सफ़र में लगा एक गतिरोध है आ गया.


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शब्द हैं अनगिनत,भाव का सिन्धु है, किन्तु दोनों में पल न समन्वय हुआ
शब्द थे डूब खुद में ही बैठे रहे, और था भाव अपने में तन्मय हुआ
छन्द छितरा गये, लक्षणा लड़खड़ा, व्यंजना को व्यथायें सुनाती रही
आज अभिव्यक्तियां अपनी असमर्थ है, लीजिये अन्तत: बस यही तय हुआ

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