कैद सरगम

कैद सरगम, दर्द की शहनाईयों में रो रही है
आँसुओं के बीज, आँखों में निरन्तर बो रही है

स्वर भटकता कंठ के जा द्वार को है खटखटाता
पर निरुत्तर शून्य से कर सामना है लौट आता
शाख पर संचार की, अब फूल खिल पाते नहीं हैं
शब्द के, फिर से यहां पर स्याह पतझर जीत जाता

हो रही अवलोड़ना उठती तरंगों में निशा दिन
किन्तु ऐसा लग रहा है ध्येय अपना खो रही है

ठोकरों में राह की हैं भाव की अनगढ़ शिलायें
उक्तिया मिल सूक्तियों से कर रही हैं मंत्रणायें
बेरूखी से शिल्प की ऊबी हुई हैं मन मसोसे
हाथ पर रख हाथ बैठीं लक्षणायें व्यंजनायें

दूर अपने उद्गमों से काव्य-कालिन्दी, सरोवर
के तटों पर बैठ रह रह हाथ अपने धो रही है

व्याकरण के क्रुद्ध तेवर रोकते पथ भावना का
काटते हैं पर उड़ी हर कल्पना का कामना का
अधिनियम के कटघरे में बन्दिनी, अपराधिनी सी
जो खड़ी है, जल न पाता दीप कोई साधना का

हो रहे आलाप वैसे, हर तरफ़ मल्हार के ही
किन्तु बारिश अग्नि की ही, अब गगन से हो रही है.

Comments

Pratik said…
बहुत सुन्दर कविता है। शब्द-चयन भी उत्तम है।
Udan Tashtari said…
राकेश जी,

"हो रहे आलाप वैसे, हर तरफ़ मल्हार के ही
किन्तु बारिश अग्नि की ही, अब गगन से हो रही है."

हर बार की तरह ही, बहुत बहतरीन.
बधाई.

समीर लाल
Anonymous said…
Rakesh Ji,
Shabd chitr bahut sundar kheeche hain. Dil me utar jatee hai aapki yah kavita. meree anant shubh kamnaayen.
Rama Dwivedi
Shardula said…
वेदना के क्षितिज पे कुछ अस्त होती रश्मियाँ पा
गीलीं पलकों पे रुके कुछ इन्द्रधनुषी काफिले आ
शब्द आते ह्रदय में पर छू अधर पाते नहीं हैं
होते वही हैं गीत सच्चे जिनको हम गाते नहीं हैं

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