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Showing posts from September, 2005

तीन गीत

गीत तेरे होंठ पर

गीत तेरे होंठ पर खुद ही मचलने लग पड़ें आ
इसलिये हर भाष्य को व्यवहार मैं देने लगा हूँ

देव पूजा की सलौनी छाँह के नग्मे सजाकर
काँपती खुशबू किसी के नर्म ख्यालों से चुराकर
मैं हूँ कॄत संकल्प छूने को नई संभावनायें
शब्द का श्रन्गार करता जा रहा हूँ गुनगुनाकर

अब नयन के अक्षरों में ढल सके भाषा हॄदय की
इसलिये स्वर को नया आकार मैं देने लगा हूँ

रूप हो जो आ नयन में खुद-ब-खुद ही झिलमिलाये
प्रीत हो, मन के समंदर ज्वार आ प्रतिपल उठाये
बात जो संप्रेषणा का कोई भी माध्यम न माँगे
और आशा रात को जो दीप बन कर जगमगाये

भावना के निर्झरों पर बाँध कोई लग न पाये
इसलिये हर भाव को इज़हार मैं देने लगा हूँ

मंदिरों की आरती को कंठ में अपने बसाकर
ज्योति के दीपक सरीखा मैं हॄदय अपना जला कर
मन्नतों की चादरों में आस्था अपनी लपेटे
घूमता हूँ ज़िन्दगी के बाग में कलियाँ खिलाकर

मंज़िलों की राह में भटके नहीं कोई मुसाफ़िर
इसलियी हर राह को विस्तार मैं देने लगा हूँ

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दहलीज का पत्थर

शुक्रिया, दहलीज का पत्थर मुझे तुमने बनाया
है सुनिश्चित अब तुम्हारे पांव की रज पा सकूँगा

जब किसी देवांगना के हाथ …

केवल तुम

मेरे दर्पण की परछाईं के नैन में चित्र तेरे नजर मुझको आते रहे
मेरे अधरों पे तेरे सुरों से जगे, गीत, आकर गज़ल गुनगुनाते रहे
मेरे सपनों का विस्तार सिमटा रहा,तेरे लहराते आँचल के अंबर तले
तेरे अहसास के दीप हर साँझ को, मेरी गलियों में आ जगमगाते रहे

तूलिक मचली जब उंगलियों में मेरी, चित्र तेरे ही केवल बनाती रही
तेरे होठों की स्मित का स्पर्श पा, बाग की हर कली मुस्कुराती रही
लेखनी कोशिशें करते करते थकी, पर नहीं न्याय कर पयी है रूप से
चूम कर पग तेरे भोरे की रश्मियाँ मेरी राहों में कंचन लुटाती रहीं.

गंध की परछाईयाँ

गंध की परछाईयों के बन के अनुचर रह गये हम
अब नही संभव रहा हम राह अपनी ढूंढ़ पायें


धूप के जिन पनघटों से, भोर भर लाते कलसिया
आज उसकी राह में हैं उग रहे जंगल कँटीले
सांझ की जो पालकी दिन के कहारों ने उठाई
बींध कर उसको गये हैं दंश विधना के नुकीले

रात की काली दुशाला में हज़ारों छेद हैं अब
कोई भी दर्जी नहीं है, हम रफ़ू किससे करायें

मान कर प्रतिमान जिनको, ज़िन्दगी हमने बिताई
मूल्य बदले हैं समय की करवटों के साथ उनके
सींचते संबंध के वटवॄक्ष जिनको हम रहे थे
वे सहारों के लिये अब ढूँढ़ते हैं स्वयं तिनके

शब्द का जो कोष संचित कर रखा था, लुट गया है
रिक्त हैं कुछ पॄष्ठ बाकी, क्या पढ़ें हम क्या सुनायें

आप- संपूर्ण प्रस्तुति

प्रीत मेरी शिराओं में बहती रही शिंजिनी की तरह झनझनाये हुए
छेड़ता मैं रहा नित नई रागिनी बाँसुरी को अधर पर लगाये हुए
कल्पना की लिये तूलिका आज तक एक ही चित्र में रंग भरता रहा
मैने देखा तुम्हें लेते अंगड़ाईयाँ दूधिया चांदनी में नहाये हुए
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मुस्कुराने लगीं रश्मियाँ भोर की क्षण दुपहरी के श्रन्गार करने लगे
झूमने लग पडीं जूही चंपाकली रंगमय गुलमोहर हो दहकने लगे
यूँ लगा फिर बसन्ती नहारें हुईं इन्द्रधनुषी हुईं सारी अँगनाईयाँ
रंग हाथों की मेंहदी के, जब आपके द्वार की अल्पनाओं में उतरने लगे
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आपके ख्याल हर पल मेरे साथ थे सोच में मेरी गहरे समाये हुए
मेरी नजरों में जो थे सँवरते रहे चित्र थे आपके वे बनाये हुए
साँझ शनिवार,श्रन्गार की मेज पर भोर रविवार को लेते अँगडाइयाँ
औ' बनाते रसोई मे खाना कभी अपना आँचल कमर में लगाये हुए
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.चित्र आँखों में मेरी बनाते रहे याद के प्रष्ठ कुछ फ़डफ़शाते हुए
रंग ऊदे, हरे,जामनी कत्थई भित्तिचित्रों से मन को सजाते हुए
मेरी पलकों के कोरों पे अटका हुअ चित्र है एक उस साँझ का प्रि…

गीत संकलन

बांसुरी


मन हो घनश्याम करता प्रतीक्षा रहा
आप राधा बने जब इधर आयेंगे
ज़िन्दगी की मेरी बाँसुरी के स्वरों
पर नये गीत खुद ही सँवर जायेंगे
रात भर थे सितारे जले, आपको
साथ ले आयेंगी रश्मियां भोर की
आस्था का सिरा थाम कर हर घडी
थी सुलगती रही आस की डोर भी
पर न आई उषा,बादलों में छुपे,
सूर्य ने घर के बाहर न भेजा उसे
और फिर रह गये स्वप्न बिखरे हुऎ
घोर तन्हाई के विषधरों से डंसे
एक दीपक खडा सांझ के द्वार पर
जुगनुओं को शिखा पर सजाये हुए
सोचते, आपके द्रष्टि - स्पर्श से
फूल बन ये गगन में बिखर जायेंगे
हाथ की धुन्ध रेखाओं में ढूँढते
उम्र गुजरी, न किस्नत की कोई मिली
भाग्य ने द्वार खोला नहीं कोई भी
दस्तकें देते दोनों हथेली छिली
लग रहा कोई आसेब का चक्र सा
गिर्द मेरे निरन्तर है चलता हुआ
वक्त के ज्योतिषी ने कहा, आपके
आगमन से ही सुधरेगी यह ग्रहदशा
आँज उत्सुक पलों को नयन में, मेरी
पन्थ, पगडंडियाँ हैं निहारा करीं
पाके सिकता के कण आपके पाँव से
रंग साधों के सिन्दूर हो जायेंगे
सोचता हूँ कि मनुहार जो कर रहा
शीघ्र ही वे फ़लीभूत हो जायेंगी
आपजी पालकी के सिरे से बँधी
वाटिका में बहारें चली आयेंगी
रेशमी कल्पनाओं की अँगडाईयाँ
नभ को छूने लगेंगी उठा हाथ को
तुष्…

प्यार की पाती

लिखी है पाँखुरी पर ओस से जो भोर ने आकर
तुम्हारे नाम भेजी थी वो मैने प्यार की पाती
चितेरी वादियों में गंध ने पुरबाई से मिलकर
सपन की चूनरी, है जन्म के अनुबंध से काती

नयन की छैनियों ने कल्पना को शिल्प में ढाला
हृदय की आस ने वरदान को आकार दे डाला
हजारों साधनायें आज हैं अस्तित्व में आईं
तपस की साध ने जिनको अभी तक मंत्र में पाला
ढली है आज जो प्रतिमा, तुम्हें शायद विदित होगा
क्षितिज पर रोज ही प्राची, यही इक चित्र रच जाती

अधर के बोल के आमंत्रणों का आज यह उत्तर
गगन से रश्मियों के साथ आया है उतर भू पर
बँधे जो धड़कनों से साँस के सौगन्ध के धागे
लगा है गूँजने कंपन भरा उनका सुरीला स्वर
मचलतीं लहरियाँ फिर आज वे सब गुनगुनाती सी
जिन्हें हम छेड़ते थे साँझ को करते दिया-बाती

लगा यायावरी हर कामना ने नीड़ पाया है
तुम्हारे पंथ ने सहचर मुझे अपना बनाया है
पड़ी इक ढोलकी पर थाप, ने शहनाई से मिल कर
पिरो नव-राग में वह गीत फिर से गुनगुनाया है
जिसे तुम बैठ कर एकाकियत के मौन इक पल में
नदी की धार के संग सुर मिला कर थीं रही गाती

राकेश खंडेलवाल
अगस्त २००५