Posts

Showing posts from August, 2005

15 अगस्त

आ गया है आज फिर इतिहास से उठ कत वही दिन
और फिर उस पर मुलम्मा हम चढ़ाते जा रहे हैं

उत्तरों की कर प्रतीक्षा प्रश्न ने दम तोड़ डाला
पंच वर्षी स्वप्न का इस बार भी है रंग काला
वायदों के शब्द अंबर में टँगे बन कर सितारे
चाँद का साया नहीं पाया, गगन कितना खंगाला
शुष्क आँखों में न कण भी अश्रुओं का शेष बाकी
शून्य के साम्राज्य में हर कामना है छटपटाती
व्योम की हर वीथि का अवरोध गिद्धों ने किया है
एक गौरैया सहज सी आस की भी उड़ न पाती

फ़र्क क्या पड़ता किसी को , हो खरा, खोटा भले हो
माँग सिक्के की, जिसे हम सब चलाये आ तहे हैं

नीम की शाखाओं पर आ धूप तिनके चुन रही है
बाँसुरी शहनाईयों की मौन सरगम सुन रही है
बादलों के चंद टुकड़ों की कुटिल आवारगी के
साथ मिल षड़यंत्र, झालर अब हवा की बुन रही है
फूल के संदेश माली कैद कर रखने लगा है
योजना के चित्र पर फिर से सपन उगने लगा है
मच रहे हड़कंप में बाजी उसी के हाथ लगती
जो दिये को नाग के फन पर यहाँ रखने लगा है

स्वर्ण-पल के आठवें वर्षाभिनन्दन का समारोह
किन्तु हम फिर भी मनाते जा रहे हैं, गा रहे हैं.)


राकेश खंडेलवाल

My Photo

Image

है सभी कुछ वही

एक दीपक वही जो कि जलते हुए
मेरे गीतों में करता रहा रोशनी
एक चन्दा वही, रात के खेत में
बीज बो कर उगाता रहा चाँदनी
एक पुरबा वही, मुस्कुराते हुए
जो कि फूलों का श्रन्गार करती रही
एक बुलबुल वही डाल पर बैठ जो
सरगमों में नये राग भरती रही


भोर भी है वही, औ वही साँझ है
सिर्फ़, लगता है मैं ही बदलने लगा

जो संदेसा सुबह ने था आके दिया
आवरण था नया, बात थी पर वही
हैं वही चंद उलझे हुए फ़लसफ़े
है कहानी वही जो रही अनकही
है वही धूप गुडमुड सी लटकी हुई
अलगनी के अकेले उसी छोर पर
है वही एक खामोश पल वक्त का
मुँह छुपाता, गली के खडा मोड पर

मंज़िलें भी वही, राह भी है वही
सिर्फ़ निश्चय सफ़र का बदलने लगा

है धुआँसा धुआँसा वही आँगना
वो ही कुहरे में लिपटा हुआ गाँव है
वो ही साकी, वही मयकदा है, वही
लडखडाते, सँभलते हुए पाँव हैं
वो ही दहलीज आतुर बिछाये नयन
आस पग चुम्बनों की सजाये हुए
और यायावरी एक जोगी वही
धूनी पीपल के नीचे रमाये हुए

रंग भी हैं वही, कैनवस भी वही
तूलिका का ही तेवर बदलने लगा

राकेश खंडेलवाल