गुलाब कर लूं

जो आरिजों पर हवा ने आकर लिखे हैं सिहरन के चंद लम्हे
मैं सोचता हूँ कि आज उनको तेरे अधर के गुलाब कर लूँ
जो दिल के बरकों पर धड़कनों से लिखी है यादों ने सांझ आकर
मैं सोचता हूँ तेरे नयन को उन इबारतों की किताब कर लूँ
अभी बहुत सा है कर्ज़ बाकी मेरे तुम्हारे अहदे वफ़ा का
जो मिल गये हो तुम आज क्यों न मैं उन सभी का हिसाब कर लूँ
नजर में अपनी सवाल अनगिन रही उठाती ये ज़िन्दगानी
ले साथ तेरा मैं इन सवालों को सोचता हूँ जवाब कर लूँ

Comments

Shar said…
"अभी बहुत सा है कर्ज़ बाकी मेरे तुम्हारे अहदे वफ़ा का
जो मिल गये हो तुम आज क्यों न मैं उन सभी का हिसाब कर लूँ "
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पहली बात तो, इन posts में आपको शायरी करते देख बहुत अच्छा लगा !! क्या बात थी, जरा हमें भी तो बताईये :)
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अहमद फ़राज़ साहिब को "अहदे वफ़ा" पे सुनिये:

"कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जानां
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते

जश्ने-मक़तल ही न बरपा हुआ वरना हम भी
पा बजौलाँ ही सही नाचते गाते जाते

उसकी वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था के न था
तुम फ़राज़ अपनी तरह से तो निभाते जाते "

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