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नूतन वर्षाभिनन्दन

उठी अवनिका प्राची पर से नई किरण लेती अँगड़ाई
नवल आस को लिये भोर नव नये राग पर गाती आये
नया दीप है नई ज्योत्सना और नया विश्वास हॄदय में
यह नव वर्ष नये संकल्पों से कर्मठता और बढ़ाये

आशंका, संत्रास भ्रमित पल परिचय के धागों से टूटें
थकन, निराशा औ' असमंजस सब ही पथ में पीछे छूटें
आंजुरि का जल अभिमंत्रित हो पल पल नूतन आस उगाये
और आस्था हर इक सपना दिन दिन शिल्पित करती जाये

जीवन की पुस्तक का यह जो एक पॄष्ठ है समय पलटता
उसका नव संदेश प्राण में अनुष्ठान हो नूतन भरता
प्रगति पंथ की मंज़िल आकर भित्तिचित्र बन सके द्वार पर
नये वर्ष की अगवानी में यही कामना हूँ मैं करता.

राकेश खंडेलवाल
नव वर्ष २००६

खुशबू

बजी है बाँसुरी बन कर तुम्हारे नाम की खुश्बू
अधर पर थरथराती है तुम्हारे नाम की खुश्बू
कलम हाथों में मेरे आ गई जब गीत लिखने को
महज लिख कर गई है बस तुम्हारे नाम की खुश्बू
तुम्हीं पर जीस्त का हर एक लम्हा थम गया अब तो
कभी आगाज़ की खुश्बू कभी अंजाम की खुश्बू
दरीचे से उतर कर धूप आती है जो कमरे में
लिये वो साथ आती है महकती शाम की खुश्बू
मेरी हर सांस की पुरबाई में है घुल गई ऐसे
कि सीता की सुधी में ज्यों बसी हो राम की खुश्बू
जुड़ी है जाग से भी नींद से भी रात दिन मेरी
हुई गलियों में रक्सां आ तुम्हारे गांव की खुशबू

गीत बन

स्वर उठा कंठ से शब्द से कह रहा
गीत बन गीत बन, भाव है बह तहा

अर्थ दे तू स्वयं को नये आज से
आंसुओं में उगा बीज मुस्कान के
जो मिली है धरोहर तुझे ्वंश की
दे बदल मायने उनकी पहचान के

चल बदल वक्त के साथ रफ़्तार बन
तू अभी तक क्यों इतिहास में रह रहा

जो छुपे अर्थ कर दे प्रकाशित उन्हें
अपने विस्तार को जान तो ले सही
हो ध्वनित, सब प्रतीक्षा में च्याकुल खड़े
क्यों जमाये हुए है तू मुंह में दही

मौन तो अंत ही स्पंदनों का रहा
किसलिये फिर व्रथा वेदना सह रहा
गीत बन गीत बन

गुलाब कर लूं

जो आरिजों पर हवा ने आकर लिखे हैं सिहरन के चंद लम्हे
मैं सोचता हूँ कि आज उनको तेरे अधर के गुलाब कर लूँ
जो दिल के बरकों पर धड़कनों से लिखी है यादों ने सांझ आकर
मैं सोचता हूँ तेरे नयन को उन इबारतों की किताब कर लूँ
अभी बहुत सा है कर्ज़ बाकी मेरे तुम्हारे अहदे वफ़ा का
जो मिल गये हो तुम आज क्यों न मैं उन सभी का हिसाब कर लूँ
नजर में अपनी सवाल अनगिन रही उठाती ये ज़िन्दगानी
ले साथ तेरा मैं इन सवालों को सोचता हूँ जवाब कर लूँ

वो तो

वो बुझे दियों की कतार थी जो कि मेरे आसपास थी
मैने समझा था जिसे चांदनी, वो तो झुटपुटे का कुहास थी

जिसे ढूँढ़ती रही नजर, फ़ंसी भटकनो में इधर उधर
मुझे ये मगर न हुई खबर, वो तो गुमशुदा ही तलाश थी

मेरी आरज़ुओं की हर थकन, सुकूं माँगती थी शबे सहर
मैने समझा जिसको कुमोदिनी वो तो एक दहका पलाश थी

भर भर घड़े उंड़ेलकर , दिये पनघटों ने पुकार कर
जो बुझी न पल के लिये मगर, वो मरुस्थली मेरी प्यास थी

जिसे नाम तुमने गज़ल दिया, जिसे मैने सोचा कि नज़्म है
वो जो माला शब्दों की एक थी, वो तो भावना का निकास थी

वो जो रात के प्रथम प्रहर मेरी ख्वाहिशो को समेटकर
मेरे ख्वाब में गई आ संवर, तेरे महके तन की सुवास थी

जो थी शब-बखैर की आरज़ू, जो बसी हमारे थी चार सू
जिसे सींचा है लम्हों में बांध कर, वो तेरे मिलन की ही आस थी.

वनपाखी

मन का आवारा वनपाखी अब गीत नहीं गा पाता है

कुछ रंग नहीं भर पाता है कोरे खाकों में चित्रकार
तूलिका कोशिशें करती है पर विवरण न पाती उभार
खूँटियां पकड़ ढीली करतीं रह रह सलवएं पड़ा करतीं
यूँ कैनवास यह जीवन का फिर से अपूर्ण रह जाता है

बन पाते बिम्ब अधूरे ही धुंधला धुन्धला मन का दत्पण
चिलमन की ओट छुपा लेती मनमोहक हर बांकी चितवन
पन्ने पलटे दिन रात मगर, अक्षर पुस्तक के फढ़े नहीं
यूँ ढाई आखर का लेखा, अनपढ़ा पुन: रह जाता है

नित ॠचा उचारा करी मगर मंत्रों से भाग्य नहीं जागे
सांसों की एक भिखारिन हर इक गली मोड़ रुकरुक मांगे
खाली झोली, पाथेय नहीं राहों का कुछ भी पता नहीं
यूँ उठ पाने से पहले ही हर बार कदम रुक जाता है

साधक सी लगन जगी लेकिन मिल पाया कोई साध्य नहीं
निर्जन हो गये सभी मंदिर है कोई भी आराध्य नहीं
पूजा की थाली सजी मगर हैं क्रूर थपेड़े आँधी के
यूँ ज्योतित होने से पहले हर बार दिया बुझ जाता है

सुधियों की डोर थामता है अक्सर मन का एकाकीपन
भूली भटकी स्मॄतियों की कुछ और अधिक बढ़ती तड़पन
पथ में हैं मोड़ बने इतने,दो कदम साथ न संव्हव हैं
यों परिचय होने से पहले हर कोई बिछड़ता जाता है

बस्ती के इकलौते पनघट पर गूँज नहीं …

आप-निवेदन

काव्य मेरा सॄजित, य्रे सिमट कर कहीं बंद होकर किताबों में ही न रहे
आपके कंठ की रागिनी थाम कर, आपके होंठ पर ये मचलता रहे
कल्पना ने मेरी जिसमें गोते लगा, शब्द श्रन्गार को आपके हैं चुने
मेरी भाषा की भागीरथी आपके द्वार के सामने से निरंतर बहे

राकेश खंडेलवाल
नवंबर २००५

कविता पुरानी

धड़कनो< की ताल पर गाने लगी है ज़िन्दगानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी

धूप में डूबे हुए कुछ तितलियो< के पंख कोमल
पर्वतों को ले रहीं आगोश में चंचल घटायें
झील को दर्पण बना कर खिलखिलाते चंद बादल
प्रीत की धुन पर थिरकती वादियों में आ हवायें

लिख रहे हैं भोज पत्रों पर नई फिर से कहानी
याद मुझको आ रही है फिर कोऊ कविता पुरानी

वॄक्ष पर आकर उतरते इन्द्रधनु्षों की कतारें
गुनगुनाती रागिनी से रंग सा भरती दुपहरी
लाज के सिन्दूर में डूबी हुई दुल्हन प्रतीची
और रजनी चाँदनी की ओढ़कर चूनर रुपहरी

भोर की अँगड़ाईयों से हो रहा नभ आसमानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी

पतझड़ी संदेशवाहक बाँटता सा पत्र सबको
स्वर्ण में लिपटा हुआ संदेश का विस्तार सारा
खेलती पछुआ अकेली शाख की सूनी गली में
राह पर नजरें टिकाये भोर का अंतिम सितारा

कर रही ऊषा क्षितिज पर, रश्मियों संग बागवानी
याद मुझको आ रही है फिर कोई कविता पुरानी


आरिजों पर दूब के हैं प्रीत चुम्बन शबनमों के
फूल ने ओढ़ी हुई है धूप की चूनर सुनहरी
हंस मोती बीनते हैं ताल की गहराईयों से
पेड़ की फुनगी बिछाये एक गौरैया मसहरी

कह रही नव, नित्य गाथा प्रकॄति इनकी जुबानी
याद मुझको आ रही ह…

अधूरी गाथा

पॄष्ठ रहे सब के सब कोरे, सुध-बुध बिसरा कलम सो गई
शब्द भाव के बीच निरंतर, बढ़ती रही बीच की दूरी
करते करते यत्न थक गया, पर अंतिम अध्याय न लिखा
जीवन के इस रंगमंच की हर गाथा रह गई अधूरी.

तुम-केवल तुम

भोर आती रही, रात जाती रही
काल का चक्र तुम से ही चलता रहा

एक तन्हाई लेकर तुम्हारी छवि
दस्तकें साँझ के द्वार देती रही
नीड को लौटते पँछियों की सदा
नाम बस इक तुम्हारा ही लेती रही
धुन्ध बढती हुई, दिन छिपे, व्योम में
आकॄति बस तुम्हारी बनाती रही
याद बन कर दुल्हन, रात की पालकी
बैठ, कर सोलह श्रन्गार आती रही

स्वप्न बीते दिनों को बना कूचियाँ
आँख के चित्र रंगीन करता रहा

लेके रंगत तुम्हारे अधर की उषा
माँग प्राची की आकर सजाती रही
पाके सरगम तुम्हारे स्वरों से नई
कोयलें प्यार के गीत गाती रहीं
ले के थिरकन तुम्हारे कदम से नदी
नॄत्य करती हुई खिलखिलाने लगी
गन्ध लेकर तुम्हारे बदन की हवा
मलयजी; वादियों को बनाने लगी

आसमाँ पा तुम्हारी नयन-नीलिमा
अपने दर्पण में खुद को निरखता रहा

जो तुम्हारे कदम के निशाँ थे बने
मन-भरत को हुए राम की पादुका
भाव घनश्याम बन कर निहारा किये
तुम कभी रुक्मिणी थीं कभी राधिका
चित्र लेकर तुम्हारे अजन्ता बनी
बिम्ब सारे एलोरा को तुम से मिले
हैं तुम्ही से शुरू, हैं तुम्ही पर खतम
प्रेम-गाथाओं के रंगमय सिलसिले

एक तुम ही तो शाश्वत रहे प्राण बस
चाहे इतिहास कितना बदलता रहा

थरथराये अधर, जल तरंगें बजीं
सरगमें सैकडों मुस्कुरान…

आप-अंतराल के पश्चात

नैन में आपके है अमावस अँजी, और पूनम है चेहरे पे इठला रही
ताप्ती नर्मदा और गोदावरी, चाल का अनुसरण हैं किये जा रही
एक संदल के झोंके में घुल चाँदनी आपकी यष्टि के शिल्प में ढल रही
आपके होंठ छू वादियों में हवा, प्यार के गीत नव आज है गा रही.

तीन गीत

गीत तेरे होंठ पर

गीत तेरे होंठ पर खुद ही मचलने लग पड़ें आ
इसलिये हर भाष्य को व्यवहार मैं देने लगा हूँ

देव पूजा की सलौनी छाँह के नग्मे सजाकर
काँपती खुशबू किसी के नर्म ख्यालों से चुराकर
मैं हूँ कॄत संकल्प छूने को नई संभावनायें
शब्द का श्रन्गार करता जा रहा हूँ गुनगुनाकर

अब नयन के अक्षरों में ढल सके भाषा हॄदय की
इसलिये स्वर को नया आकार मैं देने लगा हूँ

रूप हो जो आ नयन में खुद-ब-खुद ही झिलमिलाये
प्रीत हो, मन के समंदर ज्वार आ प्रतिपल उठाये
बात जो संप्रेषणा का कोई भी माध्यम न माँगे
और आशा रात को जो दीप बन कर जगमगाये

भावना के निर्झरों पर बाँध कोई लग न पाये
इसलिये हर भाव को इज़हार मैं देने लगा हूँ

मंदिरों की आरती को कंठ में अपने बसाकर
ज्योति के दीपक सरीखा मैं हॄदय अपना जला कर
मन्नतों की चादरों में आस्था अपनी लपेटे
घूमता हूँ ज़िन्दगी के बाग में कलियाँ खिलाकर

मंज़िलों की राह में भटके नहीं कोई मुसाफ़िर
इसलियी हर राह को विस्तार मैं देने लगा हूँ

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दहलीज का पत्थर

शुक्रिया, दहलीज का पत्थर मुझे तुमने बनाया
है सुनिश्चित अब तुम्हारे पांव की रज पा सकूँगा

जब किसी देवांगना के हाथ …

केवल तुम

मेरे दर्पण की परछाईं के नैन में चित्र तेरे नजर मुझको आते रहे
मेरे अधरों पे तेरे सुरों से जगे, गीत, आकर गज़ल गुनगुनाते रहे
मेरे सपनों का विस्तार सिमटा रहा,तेरे लहराते आँचल के अंबर तले
तेरे अहसास के दीप हर साँझ को, मेरी गलियों में आ जगमगाते रहे

तूलिक मचली जब उंगलियों में मेरी, चित्र तेरे ही केवल बनाती रही
तेरे होठों की स्मित का स्पर्श पा, बाग की हर कली मुस्कुराती रही
लेखनी कोशिशें करते करते थकी, पर नहीं न्याय कर पयी है रूप से
चूम कर पग तेरे भोरे की रश्मियाँ मेरी राहों में कंचन लुटाती रहीं.

गंध की परछाईयाँ

गंध की परछाईयों के बन के अनुचर रह गये हम
अब नही संभव रहा हम राह अपनी ढूंढ़ पायें


धूप के जिन पनघटों से, भोर भर लाते कलसिया
आज उसकी राह में हैं उग रहे जंगल कँटीले
सांझ की जो पालकी दिन के कहारों ने उठाई
बींध कर उसको गये हैं दंश विधना के नुकीले

रात की काली दुशाला में हज़ारों छेद हैं अब
कोई भी दर्जी नहीं है, हम रफ़ू किससे करायें

मान कर प्रतिमान जिनको, ज़िन्दगी हमने बिताई
मूल्य बदले हैं समय की करवटों के साथ उनके
सींचते संबंध के वटवॄक्ष जिनको हम रहे थे
वे सहारों के लिये अब ढूँढ़ते हैं स्वयं तिनके

शब्द का जो कोष संचित कर रखा था, लुट गया है
रिक्त हैं कुछ पॄष्ठ बाकी, क्या पढ़ें हम क्या सुनायें

आप- संपूर्ण प्रस्तुति

प्रीत मेरी शिराओं में बहती रही शिंजिनी की तरह झनझनाये हुए
छेड़ता मैं रहा नित नई रागिनी बाँसुरी को अधर पर लगाये हुए
कल्पना की लिये तूलिका आज तक एक ही चित्र में रंग भरता रहा
मैने देखा तुम्हें लेते अंगड़ाईयाँ दूधिया चांदनी में नहाये हुए
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मुस्कुराने लगीं रश्मियाँ भोर की क्षण दुपहरी के श्रन्गार करने लगे
झूमने लग पडीं जूही चंपाकली रंगमय गुलमोहर हो दहकने लगे
यूँ लगा फिर बसन्ती नहारें हुईं इन्द्रधनुषी हुईं सारी अँगनाईयाँ
रंग हाथों की मेंहदी के, जब आपके द्वार की अल्पनाओं में उतरने लगे
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आपके ख्याल हर पल मेरे साथ थे सोच में मेरी गहरे समाये हुए
मेरी नजरों में जो थे सँवरते रहे चित्र थे आपके वे बनाये हुए
साँझ शनिवार,श्रन्गार की मेज पर भोर रविवार को लेते अँगडाइयाँ
औ' बनाते रसोई मे खाना कभी अपना आँचल कमर में लगाये हुए
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.चित्र आँखों में मेरी बनाते रहे याद के प्रष्ठ कुछ फ़डफ़शाते हुए
रंग ऊदे, हरे,जामनी कत्थई भित्तिचित्रों से मन को सजाते हुए
मेरी पलकों के कोरों पे अटका हुअ चित्र है एक उस साँझ का प्रि…

गीत संकलन

बांसुरी


मन हो घनश्याम करता प्रतीक्षा रहा
आप राधा बने जब इधर आयेंगे
ज़िन्दगी की मेरी बाँसुरी के स्वरों
पर नये गीत खुद ही सँवर जायेंगे
रात भर थे सितारे जले, आपको
साथ ले आयेंगी रश्मियां भोर की
आस्था का सिरा थाम कर हर घडी
थी सुलगती रही आस की डोर भी
पर न आई उषा,बादलों में छुपे,
सूर्य ने घर के बाहर न भेजा उसे
और फिर रह गये स्वप्न बिखरे हुऎ
घोर तन्हाई के विषधरों से डंसे
एक दीपक खडा सांझ के द्वार पर
जुगनुओं को शिखा पर सजाये हुए
सोचते, आपके द्रष्टि - स्पर्श से
फूल बन ये गगन में बिखर जायेंगे
हाथ की धुन्ध रेखाओं में ढूँढते
उम्र गुजरी, न किस्नत की कोई मिली
भाग्य ने द्वार खोला नहीं कोई भी
दस्तकें देते दोनों हथेली छिली
लग रहा कोई आसेब का चक्र सा
गिर्द मेरे निरन्तर है चलता हुआ
वक्त के ज्योतिषी ने कहा, आपके
आगमन से ही सुधरेगी यह ग्रहदशा
आँज उत्सुक पलों को नयन में, मेरी
पन्थ, पगडंडियाँ हैं निहारा करीं
पाके सिकता के कण आपके पाँव से
रंग साधों के सिन्दूर हो जायेंगे
सोचता हूँ कि मनुहार जो कर रहा
शीघ्र ही वे फ़लीभूत हो जायेंगी
आपजी पालकी के सिरे से बँधी
वाटिका में बहारें चली आयेंगी
रेशमी कल्पनाओं की अँगडाईयाँ
नभ को छूने लगेंगी उठा हाथ को
तुष्…

प्यार की पाती

लिखी है पाँखुरी पर ओस से जो भोर ने आकर
तुम्हारे नाम भेजी थी वो मैने प्यार की पाती
चितेरी वादियों में गंध ने पुरबाई से मिलकर
सपन की चूनरी, है जन्म के अनुबंध से काती

नयन की छैनियों ने कल्पना को शिल्प में ढाला
हृदय की आस ने वरदान को आकार दे डाला
हजारों साधनायें आज हैं अस्तित्व में आईं
तपस की साध ने जिनको अभी तक मंत्र में पाला
ढली है आज जो प्रतिमा, तुम्हें शायद विदित होगा
क्षितिज पर रोज ही प्राची, यही इक चित्र रच जाती

अधर के बोल के आमंत्रणों का आज यह उत्तर
गगन से रश्मियों के साथ आया है उतर भू पर
बँधे जो धड़कनों से साँस के सौगन्ध के धागे
लगा है गूँजने कंपन भरा उनका सुरीला स्वर
मचलतीं लहरियाँ फिर आज वे सब गुनगुनाती सी
जिन्हें हम छेड़ते थे साँझ को करते दिया-बाती

लगा यायावरी हर कामना ने नीड़ पाया है
तुम्हारे पंथ ने सहचर मुझे अपना बनाया है
पड़ी इक ढोलकी पर थाप, ने शहनाई से मिल कर
पिरो नव-राग में वह गीत फिर से गुनगुनाया है
जिसे तुम बैठ कर एकाकियत के मौन इक पल में
नदी की धार के संग सुर मिला कर थीं रही गाती

राकेश खंडेलवाल
अगस्त २००५

15 अगस्त

आ गया है आज फिर इतिहास से उठ कत वही दिन
और फिर उस पर मुलम्मा हम चढ़ाते जा रहे हैं

उत्तरों की कर प्रतीक्षा प्रश्न ने दम तोड़ डाला
पंच वर्षी स्वप्न का इस बार भी है रंग काला
वायदों के शब्द अंबर में टँगे बन कर सितारे
चाँद का साया नहीं पाया, गगन कितना खंगाला
शुष्क आँखों में न कण भी अश्रुओं का शेष बाकी
शून्य के साम्राज्य में हर कामना है छटपटाती
व्योम की हर वीथि का अवरोध गिद्धों ने किया है
एक गौरैया सहज सी आस की भी उड़ न पाती

फ़र्क क्या पड़ता किसी को , हो खरा, खोटा भले हो
माँग सिक्के की, जिसे हम सब चलाये आ तहे हैं

नीम की शाखाओं पर आ धूप तिनके चुन रही है
बाँसुरी शहनाईयों की मौन सरगम सुन रही है
बादलों के चंद टुकड़ों की कुटिल आवारगी के
साथ मिल षड़यंत्र, झालर अब हवा की बुन रही है
फूल के संदेश माली कैद कर रखने लगा है
योजना के चित्र पर फिर से सपन उगने लगा है
मच रहे हड़कंप में बाजी उसी के हाथ लगती
जो दिये को नाग के फन पर यहाँ रखने लगा है

स्वर्ण-पल के आठवें वर्षाभिनन्दन का समारोह
किन्तु हम फिर भी मनाते जा रहे हैं, गा रहे हैं.)


राकेश खंडेलवाल

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है सभी कुछ वही

एक दीपक वही जो कि जलते हुए
मेरे गीतों में करता रहा रोशनी
एक चन्दा वही, रात के खेत में
बीज बो कर उगाता रहा चाँदनी
एक पुरबा वही, मुस्कुराते हुए
जो कि फूलों का श्रन्गार करती रही
एक बुलबुल वही डाल पर बैठ जो
सरगमों में नये राग भरती रही


भोर भी है वही, औ वही साँझ है
सिर्फ़, लगता है मैं ही बदलने लगा

जो संदेसा सुबह ने था आके दिया
आवरण था नया, बात थी पर वही
हैं वही चंद उलझे हुए फ़लसफ़े
है कहानी वही जो रही अनकही
है वही धूप गुडमुड सी लटकी हुई
अलगनी के अकेले उसी छोर पर
है वही एक खामोश पल वक्त का
मुँह छुपाता, गली के खडा मोड पर

मंज़िलें भी वही, राह भी है वही
सिर्फ़ निश्चय सफ़र का बदलने लगा

है धुआँसा धुआँसा वही आँगना
वो ही कुहरे में लिपटा हुआ गाँव है
वो ही साकी, वही मयकदा है, वही
लडखडाते, सँभलते हुए पाँव हैं
वो ही दहलीज आतुर बिछाये नयन
आस पग चुम्बनों की सजाये हुए
और यायावरी एक जोगी वही
धूनी पीपल के नीचे रमाये हुए

रंग भी हैं वही, कैनवस भी वही
तूलिका का ही तेवर बदलने लगा

राकेश खंडेलवाल